कैंसर थीम ‘I Am and I Will’ का मकसद ऐसे ही पूरा नहीं हो जाएगा

कैंसर…. लाइलाज बीमारी, जिसका कोई इलाज नहीं है, खास तौर पर तब जब आप गरीब हैं या इस बीमारी के खर्चे उठाने के काबिल नहीं हैं। यहीं कारण है कि, ज्यादातर लोग जब कैंसर का नाम सुनते हैं और यह जानते हैं कि, उनका कोई अपना इस बीमारी की चपेट में है, तो एक पल के लिए उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक सी जाती है। ऐसा लगता है कि, हमारा अपना किसी ऐसी मुसीबत में फंस गया है जहां से हम उसे चाह कर भी बाहर नहीं निकाल सकते। लेकिन अब कैंसर लाइलाज नहीं रहा है क्योंकि कई लोगों ने कैंसर से लड़ाई लड़ी है और इस बात को प्रूफ किया है कि, अगर आदमी के अंदर ‘विल पॉवर’ हो तो वो बड़ी से बड़ी बीमारी को खत्म कर सकता है। आज के दौर में हमारे पास ऐसे कई एग्जाम्पल हैं, जिनसे आम लोग जो कैंसर से पीड़ित हैं वो इंस्पायर हो सकते हैं। लेकिन अगर फैसिलिटी न हो तो अंदर आई वो मोटिवेशन भी धीरे—धीरे खत्म हो जाती है और ज्यादातर मामलों में ऐसा ही होता है।

4 फरवरी को पूरी दुनिया में कैंसर दिवस मनाया जाता है। इस दिन का खास मकसद यही है कि, दुनिया में कैंसर से बचाव, इसका पता लगाने और इसका इलाज करने को लेकर समाज में अवेयरनेस फैलाई जाए। इस दिन को मनाने का सबसे पहला मकसद यह है कि, इस बीमारी से होने वाली मौतों पर रोक लगाई जा सकें। इस दिन को कैंसर से जुड़े मिस इंफॉर्मेशन और इससे जुड़े अंधविश्वासों को मुख्य रुप से दूर करने की कोशिश की जाती है।

जागरूकता के लिए कई तरह के कैंपेन भी चलाए जाते हैंं जैसे कि, #NoHairSelfie जिसमें कई लोग अपने सिर को मुंडवा कर कैंसर पीड़ितों की हिम्मत को बढ़ाने का काम करते हैं। साल 2019 से 2021 तक कैंसर डे सेलिब्रेशन के लिए थीम रखा गया है ‘I Am and I Will’. इस थीम का मतलब है कि ‘मैं करूंगा और मैं कर सकता हूं। इस थीम के जरिए यह ही कोशिश की गई है कि कैंसर पीड़ित व्यक्ति के अंदर विल पॉवर को बढ़ाया जा सकें और उसके पास आने वाली हर नेगेटिविटी को दूर कर सकें।

World Cancer Day

भारत और कैंसर

कैंसर जिससे पूरी दुनिया में लोग पीड़ित हो रहे हैं। हर साल औसतन 96 लाख लोग इस बीमारी के कारण मरते हैं और इनमे से सबसे ज्यादा लोगों की संख्या विकासशील और गरीब देशों में है। बात अपने देश भारत की करें तो हमारे यहां अन्य देशों के मुकाबले भले कैंसर रोगियों की संख्या कम है। लेकिन यहां के हर 10 में से 1 आदमी पर कैंसर का खतरा मंडरा रहा है। WHO की रिपोर्ट की मानें तो, भारत में कैंसर के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। पिछले दिनों 11 लाख से ज्यादा कैंसर के नए मामले सामने आए। इस दौरान 7 लाख 84 हजार 800 लोगों की मौत कैंसर से हुई है। हमारे यहां के 22 लाख से ज्यादा लोग पिछले 5 साल से कैंसर से लड़ रहे हैं। भारत की 135 करोड़ की आबादी के लिए कैंसर जानलेवा साबित होता जा रहा है, ऐसा माना जाता है कि, अगले 20 सालों में यह संख्या दोगुनी हो जाएगी। हमारे देश में कैंसर की घटनाओं में रीजन के हिसाब से डिफरेन्स नज़र आता है। जैसे कि, नार्थ—ईस्ट में मेल ओर फीमेल दोनों में कैंसर के मामले लगभग बराबर हैं, यहां ज्यादातर ‘गॉल ब्लैडर’ कैंसर से पीड़ित लोग हैं, वहीं बात चैन्नई की करें तो, यहां सबसे ज्यादा पेट के अंदर होने वाले कैंसर के मरीज मिलेंगे। लैकिन भारत का एक ओवरऑल व्यू देखें तो पुरूषों में होने वाले 50 प्रतिशत कैंसर के मामले और महिलाओं में 15 प्रतिशत मामले तंबाकू के कारण होते हैं। लेकिन भारत में कैंसर के बढ़ने यानि की रोगी के कैंसर के खतरनाक स्टेज में पहुंचने का मूल कारण कुछ और है जिनपर हमारी सरकार और लोगों को भी ध्यान देना होगा।

कैंसर के इलाज में होने वाली देरी

भारत में जो कैंसर के मरीज पाए जाते हैं उनमें से 70 से अस्सी प्रसेंट मरीज कैंसर के एडवांस स्टेज यानि की स्टेज 3 या 4 के मरीज हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि, हमारे देश में प्रॉपर हेल्थ केयर फैसिलिटी की कमी है। समय पर लोगों को इलाज नहीं मिलने के कारण आज ये मरीज कैंसर के सैकेंड लास्ट या लास्ट स्टेज में पहुंच गए हैं। जहां से वापस आ पाना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है। हमारे देश में इलाज न हो पाने के कई कारण हैं, जिनमें हॉस्पीटल की कमियां तो हैं ही साथ ही, लोकल लेवल पर बेहतर सुविधा का न मिलना, फाइनेंस की कमी, इलाज कराने के लिए लंबी दूरी तय करना जैसे कई कारण हैं। सबसे ज्यादा खराब सिचुएशन रूरल इंडिया की है जहां  की 69 प्रतिशत आबादी अब भी इलाज के लिए एक लंबी दूरी तय करती है।

इन्फ्रास्टकचर

इन्फ्रास्टकचर एक बड़ा कारण है जिसके कारण कैंसर के इलाज में सबसे ज्यादा दिक्कत आती है। मरीज को प्रॉपर सुविधा नहीं मिल पाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण इन्फ्रास्ट्रक्चर का अवेलेबल न होना है। इन्फ्रास्ट्रक्चर देश में दो तरह से आपको देखने को मिलेगा जिसे आप शहरी और ग्रामीण में बांट सकते हैं और नाम से अंदाजा लगा सकते हैं कि, कहां बेहतर सुविधा मिलती है। हैल्थ वर्कस, टेक्निकल स्टाफ्स, फिजिशियन्स और पैथालॉजिस्ट स्टाफ्स हर हॉस्पीटल्स में एक ही संख्या में मौजूद नहीं हैं। बात अर्बन इंडिया की करें तो आपको यहां कई हाई स्पेशियलिटी हॉस्पीटल्स मिल जाएंगे लेकिन रूरल इंडिया में यह एक सपनों की बात है।

ऐसा नहीं है कि, ग्रामीण इलाकों में कैंसर के इलाज के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर अवेलेबिलिटी को लेकर सरकार काम नहीं कर रही है। भारत सरकार की ओर से रिजनल कैंसर सेंटर्स की स्थापना करने और मेडिकल कॉलेजों में ओंकोलॉजी डिपार्टमेंट डेवलपमेंट डेवलप करने पर जोर दिया जा रहा है। भारत सरकार की ओर National Programme for Prevention and Control of Cancer, Diabetes, Cardiovascular Disease and Stroke प्रोग्राम के तहत हर एक बीमारी के लिए 120 करोड़ की लागत से 20 स्टेट लेवल कैंसर सेंटर्स बनाने की बात कही गई है। वहीं सरकार ने 20 मिलियन डॉलर रुपये में 23 नए तीसरे लेवल का केयर सेंटर बनाने और 27 नए कैंसर सेंटर्स बनाने की बात कही है। लेकिन अभी इन प्रोजेक्टस के पूरा होने में समय लगेगा।

World Cancer Day

क्लिनिकल रिसर्च

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि, भारत में पिछले कुछ सालों में क्लिनिकल रिसर्च के मामले में बहुत काम हुए हैं। लेकिन इसके बाद भी अभी एक प्रॉपर मेडिकल रिसर्च एनवायरमेंट डेवलप करने की जरूरत इंडिया में है। इस वातावरण को बनाने के लिए मेडिकल के क्षेत्र में ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएटस स्टूडेंट्स को इस ओर आकर्षित करना होगा और उन्हें कम्यूनिटी फिजिशियन्स और मेडिकल्स टीचर्स से जोड़ना होगा। भारत की फार्मास्यूटिकल उद्योगों ने जेनेरिक मॉलिक्यूल्स में बढ़िया ग्रोथ किया है, ऐसे में जरूरत है कि, कैंसर सेन्ट्रीक मालिक्यूल्स डेवलपमेंट रिसर्च में एक बड़ा इनवेस्ट किया जाए। ताकि भारत इस क्षेत्र में अपने लेवल पर इलाज को और आसान बना सके।  

भारत में कैंसर डेथ रेट के बढ़ने का एक बड़ा और नया प्रमुख कारण बनकर उभर रहा है। हमारे यहां के कई कैंसर सेंटर्स अच्छा उपचार उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन अभी भी उन्हें अपने स्तर में एक बदलाव लाने की जरूरत है। जरूरत है महामारी विज्ञान पर अपने रिसर्च को फोकस करने की ताकि हम भारत-केंद्रित आम कैंसर परिणाम में सुधार के लिए समाधान दे सकें। कैंसर से लड़ने के लिए अवेयरनेस के साथ ही संस्था स्तर पर एक योजनाबद्ध और टीम वर्क अप्रोच और कई तरह की रिसर्च टीम के आपसी सहयोग की जरूरत है। एक मरीज अपने अंदर कई जगहों से मोटिवेशन ला सकता है। इसके लिए वो खुद से भी प्रीपेयर हो सकता है लेकिन अगर मेंडिकल फैसिलिटीज में सही और क्रांतिकारी बदलाव नहीं हुए तो उसका मोटिवेशन लेवल डाउन हो जाएगा और ‘I Am and I Will’ का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकेगा। 

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