कहानी ‘हॉकी के मक्का’ की, ओलंपियंस के गांव में आज नहीं है कोई खिलाड़ी!

खेल को लेकर जैसे ही सवाल आता है कि, हमारे देश का राष्ट्रीय खेल कौन सा है? तो जवाब आता है ‘हॉकी’। लेकिन लोगों से उनके स्पोर्ट इंट्रेस्ट के बारे में पूछ लीजिए तो जवाब बदलकर पहुंच जाता है क्रिकेट पर। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। एक वक्त था जब भारत के लिए क्रिकेट से ज्यादा हॉकी मायने रखती थी और लोग हॉकी का मैच देखना ज्यादा पसंद करते थे। वो दौर भी ऐसा था जब भारत हॉकी के खेल का बादशाह था। लेकिन 1980 के बाद ऐसा वो दौर इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया। लेकिन ऐसा क्या हुआ? जो भारत सीधे अर्श से फर्श पर आ गया? इस बात को समझने के लिए हम आपको देश के उस गांव की कहानी के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे ‘हॉकी का गांव’ कहते हैं। इस गांव का असल नाम है संसारपुर। 

संसारपुर को हॉकी का मक्का भी कहा जाता है। अब ऐसा क्यों है वो आपको इस जगह की हिस्ट्री के बारे में जानने से पता चलेगा। इस गांव ने हॉकी के क्षेत्र में ऐसे-ऐसे खिलाड़ी दिए जिन्होंने सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के अलग—अलग देशों के लिए भी ओलंपिक तक में मैच खेले। इस गांव से जिस पहले खिलाड़ी ने सबसे ज्यादा नाम कमाया वो थे कर्नल गुरमीत सिंह गुल्लर। 1932 के ओलंपिक खेलों में उन्होंने भारत को रिप्रजेंट किया था। उनके बाद से तो इस गांव से हॉकी के कई खिलाड़ी निकले। इस गांव ने दुनिया को कई सारे इंटरनेशनल खिलाड़ी दिए हैं, वहीं इस गांव ने कुल 14 ओलंपिक हॉकी खिलाड़ी दिए है। इनमें से 9 ने भारत के लिए खेला है, 4 ने केन्या और 1 ने कनाडा के लिए ओलंपिक मैच खेले हैं। 100 गज के इलाके में यहां 14 अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हुए। ऐसी कहानी कहीं, किसी और देश में सुनने को नहीं मिलती। इस गांव से सबसे पहला विदेश टूर करने वाले खिलाड़ी सुबेदार ठाकुर सिंह जिन्हें न्यूजीलैंण्ड टूर के समय हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद्र की टीम में खेलने का मौका मिला था।

Sansarpur

अंग्रेजों को देख लोगों ने हॉकी खेलना शुरू किया था

इस गांव में हॉकी का इतिहास बहुत पुराना है। 300 साल पुराने इस गांव में आज करीब 5000 की आबादी रहती है। हॉकी को लेकर इस गांव की दीवानगी ने इसे इस खेल का मक्का बना दिया। लेकिन इसके पीछे भी एक असाधारण सी कहानी है। जिस गांव ने 14 ओलंपिक खिलाड़ी दिए उस गांव में कभी खेलने के लिए ग्राउंड तक नहीं था। यहां के लोगों ने अंग्रेजों को हॉकी खेलते हुए देखा था। ऐसे में बिना हॉकी स्टिक और बॉल के इनके मन में भी हॉकी खेलने की बात आई। ऐसे में जो सबसे पहली बात थी वो हॉकी स्टिक और बॉल की थी। गांव वाले बताते हैं कि, तब गांव के लोगों ने नेचुरल तरीके वाली हॉकी स्टिक ढूंढ़ निकाली। गांव के युवाओं ने उस समय शहतूत की पेड़ की टहनियां जो आगे से हॉकी की तरह ही मुड़ी होती थी उसे अपना हॉकी स्टिक बना लिया। इसके बाद बात फंसी बॉल पर? इसमें दिमाग लगा गांव की महिलाओं का, जिन्होंने धागे को बांध कर एक गेंद बनाई जिसे लोग ‘खुद्दो कहा करते थे। उस दौर में इस खेल को खुद्दो—कुंडी का भी नाम दिया गया था।

Sansarpur : एक ही गली के 7 खिलाड़ी खेल रहे थे ओलंपिक

इस गांव की सड़कों पर चलते हुए आपको कई पूर्व हॉकी प्लयरों के घर दिख जाएंगे इनमें से कई बार तो ओलंपिक मेडलिस्ट भी होते हैं। भारत के लिए 1964 में गोल्ड और 1968 में ब्रॉज़ मेडल जीतने वाले रिटायर्ड डिआईजी बलबीर सिंह का भी घर यहीं पर है। उन्हें 1999 में अर्जुन अवार्ड से भारत सरकार के द्वारा सम्मानित किया गया था। वे मौजूदा समय में इस गांव के सबसे बुजुर्ग ओलंपिक खिलाड़ियों में से हैं। लेकिन इस गांव में जो सबसे ज्यादा लोगों को आकर्षित करने वाली चीज है वो है संसारपुर की एक गली जिसे ‘द ओलंपिक स्ट्रीट ऑफ इंडिया’। इस गली के अगल—बगल बसे घरों में ही ये 14 ओलंपियन पैदा हुए थे। लेकिन यह गली जो आज नाले में बदली हुई दिखती है उसे देख कर हम अपने ही मन में पूछ उठते हैं कि क्या ऐसे ही हम अपने हीरोज के साथ ट्रीट करते हैं?

ओलंपिक स्ट्रीट का जलवा दुनिया ने साल 1968 के मेक्सिकन ओलंपिक में देखा। जब इस गांव से 7 खिलाड़ियों ने ओलंपिक में भाग लिया था। जिनमें से 5 भारत के लिए खेल रहे थे तो वहीं 2 केन्या की ओर से। ऐसा पहली बार था जब एक गांव से इतने खिलाड़ियों ने ओलंपिक में भाग लिया था। ये सारे खिलाड़ी बचपन के हित थे यानी लंगोटियां यार, जिन्होंने साथ पढ़ाई भी की थी और साथ ही हॉकी भी खेला था। इसके अलावा भारत ने पहली बार हॉकी वर्ल्ड कप 1975 में जीता था और यह सपना पूरा हो सका था संसारपुर के खिलाड़ी अजीत पाल के कारण जो उस समय भारतीय हॉकी टीम के कैप्टन भी थे। इस गांव से जिन 9 खिलाड़ियों ने भारत के लिए ओलंपिक खेली उनमें कर्नल गुरमीत सिंह कुल्लर, उधम सिंह कुल्लर, गुरदेव सिंह कुल्लर, दर्शन सिंह कुल्लर, बलबीर सिंह कुल्लर, कर्नल बलबीर सिंह कुल्लर रहजीत सिंह कुल्लर, तरसेम सिंह कुल्लर और अजीत पाल सिंह कुल्लर का नाम है।

Sansarpur

Sansarpur- क्यों बंद हो गया गांव से खिलाड़ियों का निकलना?

इस सवाल का जवाब पंजाब में फैले नशे के व्यापार में है। पंजाब की हवा में नशा इस तरह से घुला की कई खिलाड़ियों का करियर तबाह हो गया। हाल ही में एक फिल्म उड़ता पंजाब आई थी। जिसमें इस बारे में बहुत कुछ दिखाया गया था। फिल्म से इत्तर पंजाब में ड्रग्स एक सच्चाई है। जिसने जलंधर के गांव संसारपुर को भी अपनी जद में ले लिया। इसके कारण देश ने अपने सबसे अव्वल हॉकी प्रतिभा का एक बड़ा हिस्सा खो दिया। लेकिन ऐसा नहीं है कि संसारपुर के खून में बसे हॉकी ने हार मान ली है। आज भी यहां के बच्चे हॉकी से उतना ही प्यार करते हैं जितना कभी यहां की ओलंपियन जेनरेशन करती थी। हॉकी कोच्स की मानें तो बच्चे फिर से हॉकी की ओर आ रहे हैं जरूरत है कि, अब सरकार भी इस गांव की ओर बेहतरी का हाथ बढ़ाएं ताकी संसारपुर ‘इंडिया के गेम’ का फिर से मक्का बन सकें।

Indian

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

Mohapatra Brahmin: वो अछूत कम्यूनिटी, जिसे लोग 'मौत का व्यापारी' कहते हैं।

Thu Dec 19 , 2019
Share on Facebook Tweet it Pin it Email भारत, कल्चरर्स के फ्यूजन का एक अनोख रंग यहां देखने को मिलता है। परंपराएं और रीति-रिवाजों का जो भंडार यहां है वो शायद ही कहीं होगा। भारत के कल्चर में जन्म से लेकर मौत तक के लाइफ प्रोसेस को एक अलग ही […]
Mohapatra Brahmin