कहानी ‘सोनागाछी’ के सशक्त सेक्स वर्कर की, जिन्होने स्थापित किया खुदका को—ऑपरेटिव बैंक

‘सोनागाछी’ बंगाल का एक जिला है, जिसका नाम सुनते ही लोग चुप—चुप—चुप कहने लगते हैं। क्योंकि पश्चिम बंगाल का यह जिला जिस कारण से फेमस है उसे हमारे समाज में नीच, गंदा और बुरा काम माना जाता है। लेकिन समाज की इसी सोच के कारण यहां रहने वाली एक बड़ी आबादी देश और राज्य में भारतीय संविधान की ओर से मिले अधिकारों से वंचित रह जाती हैं। सोना मतलब गोल्ड और गाछी मतलब पेड़, यानि सोने का पेड़।

इतिहासकारों के अनुसार, यहां सनाउल्ला नाम का कुख्यात डकैत अपनी मां के साथ रहा करता था। यह डाकू बाद में संत बन गया और उसी ने इस शहर की नींव रखी। लेकिन इस सोने के पेड़ से जब से ‘सेक्स मंडी’ या ‘रेडलाइट’ एरिया का नाम जुड़ा, सोने की चमक फींकी पड़ती गई और गंदगी के अंबार ने इसे ढ़क लिया। सोनागाछी भारत ही नहीं एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया है। 2012 के आंकड़ों की मानें, तो इस इलाके में 14,000 से ज्यादा सेक्स वर्कर्स हैं। देह व्यापार यहां कब से हो रहा है इसका कोई सुनिश्चित इतिहास तो पता नहीं है लेकिन हां इस सोनागाछी के फिर से सोने की तरह चमकने की शुरूआत हुई है जो बंगाल सहित देश और दुनिया ने देखा है।

सोनागाछी

Usha- जो कभी नहीं बदली वो कहानी अब बदली है

सोनागाछी, यह नाम सिर्फ सेक्स और सेक्स वर्कर के बारे में नहीं है। यह यहां की ऐसी कहानियों के बारे में बताती है जो यहां की गलियों में कई सालों से रोज घटती हैं, लेकिन इन कहानियों का दम इन्हीं गलियों में घोंट दिया जाता है। हर दिन सड़क की एक ओर बसी इन बस्तियों में हिंसा, दर्द, आतंक की कहानियां यहां रोज आकार लेती हैं जो यहां की महिलाओं के चेहरों पर साफ तौर पर देखी जा सकती हैं। लेकिन इन सेक्स वर्कर की जिंदगी से ये कहानियां अब धीरे—धीरे ही सही लेकिन दूर हो रही हैं। कल तक जो महिलाएं सोनागाछी की अबलाएं कहीं जाती थी वो आज इसी सोनागाछी की सबलाएं बन चुकी हैं।

सेक्स के इस व्यापार में शामिल यहां की ज्यादात्तर महिलाएं ग्रामीण इलाकों से आती हैं। किन्हीं को उसके पति ने छोड़ दिया तो, किसी को कोई लाकर यहां बेच गया। लेकिन गरीबी और लाचारी यहां भी इनके पीछे चलती रही। साल 1992 में एक नई बीमारी फैली, उस समय इस बीमारी के बार में ज्यादात्तर लोग अंजान थे। एड्स इस दौर में काफी तेजी से फल रहा था। एड्स सेक्सुअली ट्रांसमीट होने वाली बीमारी थी, लेकिन सोनागाछी के सेक्स वर्कर के बीच इसे लेकर अवेयरनेस जैसी कोई चीज नहीं थी, तब सेक्स वर्कर कंडोम का इस्तेमाल भी नहीं करती थी, जिससे इस बीमारी के फैलने का खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है। इस बीमारी के तेजी से फैलने को लेकर सरकार के बीच चिंता थी। वह इसके रोकथाम के लिए काम करने में लगी थी और तभी सरकार ने सोनागाछी में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट पब्लिक हेल्थ एंड हाइजीन की एक टीम भेजी।

इस टीम का नेतृत्व कर रहे थे डॉ. समरजीत जाना। इनका काम था कि, सोना गाछी में एचआईवी एड्स के बारे एविडेंस बेस्ड स्टडी के आधार पर पता लगाना। लेकिन यह कोई आसान काम नहीं था। करीब चार महीने सेक्स वर्कर को समझाने के बाद वे लोग इस काम में सहयोग करने के लिए तैयार हुए। फिर जो रिपोर्ट सामने आई वो चौंकाने वाली थी। इस रिपोर्ट के आधार पर सेक्स वर्करों को एचआईवी एड्स के बारे में जागरूक और शिक्षित किया गया। साथ ही साथ इन्हें सेक्स सेफ्टी के लिए कंडोम जैसी चीजें यूज करने को लेकर प्रोत्साहित किया गया। लेकिन यहां से बात कहीं और पहुंची। डॉ. समरजीत जाना बताते हैं —

”ये लोग मुझमें वो चीज देख रहे थे जो इन्होंने इससे पहले कभी नहीं सोचा था। सेक्स वर्कर के लाइफ में डेली के कई दिक्कते हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात रोज होनेवाली हिंसा का है, जिसके बारे में न तो सामाज को काई चिंता है न हीं सरकार को। ऐसे में इन लोगों ने मुझसे इस बारे में कुछ करने को कहा। मैंन कहा कि मै सिर्फ हेल्थ के बारे में काम कर सकता हूं, लेकिन अगर आप लोग खुद से इस मामले पर एकजुट होकर आवाज उठाएं तो मै इसमें हर तरह की सहयोग करूगां”

यहीं से दुरबार महिला समन्वय समिति की स्थापना हुई। दुरबार का मतलब होता है अपराजय। दुरबार 1992 में बना और धीरे—धीरे इसके चलते सोनागाछी की सोई हुई महिलाशक्ति जागने लगी। दुरबार में ज्यादात्तर काम करने वाली महिलाएं पूर्व सेक्स वर्कर ही थी। ऐसे में इन्हें उन परिस्थितियों के बारे में पता था जिससे यहां की महिलाओं को गुजरना पड़ता है। इस समिति ने ‘थ्री आर’ के फॉर्मूले को अपनाया। थ्री आर यानि की रिस्पेक्ट, रिलायंस और रिकॉगनेशन। दुरबार ने अपनी पहुंच ज्यादा से ज्यादा सेक्स वर्करों के बीच बनाई और पहली वह संस्था बनी जिसने सेक्स वर्करों को वो रिस्पेक्ट दिया जो वो वर्षो से चाहती थी।

सोनागाछी

ऐसे बना सेक्स वर्करों का पहला Usha Cooperative bank

सोनागाछी की महिलाओं के लिए दुरबार एक बड़ा प्लेटफॉर्म बन गया जहां ये लोग अपनी आवाज को उठा सकती थी। लेकिन इतना इनके लिए काफी नहीं था। दुरबार ने यहां की महिलाओं को हेल्थ, हाइजीन और हिंसा को लेकर जागरूक भी किया ओर आवाज उठाने के काबिल भी बनाया। लेकिन अभी भी यहां की महिलाएं पैसो के मामले में पूरी तरह से बैंकिंग सिस्टम से बाहर थी। इनकी रोज की जिंदगी में बैंक नाम की कोई चीज़ नहीं थी, जो ये कमाती थी उसका कुछ हिस्सा तो इन्हें दादाओ को चुकाना होता है। वहीं यहां भी एक साहुकार वाला सिस्टम हुआ करता था कि, अगर ये लोग कहीं से कर्ज लेते थे तो यह कर्ज इन्हें इतने ज्यादा ब्याज पर मिलता था कि, उसका इंट्रेस्ट चुकाते—चुकाते इन लोगों की उम्र निकल जाती थी। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत थी इन लोगों में साक्षरता की कमी।

इनकी कहानी प्रेमचंद्र के साहित्यों में उस इंसान की तरह है जो सूदखोर साहूकारों से लिए कर्ज को चुकाते—चुकाते मर जाता था। किसी भी इंसान के जीने के लिए उसका खुद का एक एस्टिमेटेड बजट होता है और यह बजट उसकी कमाई पर और उससे हुई सेविंग्स के आधार पर बनता है। लेकिन इन सेक्स वर्करों के संग ऐसा कुछ भी नहीं था। इसी कमी को पूरा करने के लिए साल 1995 में ‘उषा मल्टी पर्पस को—ऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड’ को अस्तित्व में लाया गया, जिसके जरिए सोनागाछी की सेक्स वर्कर महिलाएं भी बैंकिंग सेवा से जुड़ सकीं।

इन सभी कामों में इन महिलाओं का सहयोग कर रहे डॉ समरजीत जाना बताते हैं कि, यह कोई आसानी से होने वाला काम नहीं था। इस को—ऑपरेटिव सोसायटी को रजिसटर्ड कराना ही सबसे बड़ी समस्या थी क्योंकि लॉ में ऐसी बात थी जो इसे पूरा नहीं होने दे रही थी। लॉ ‘गुड मोरल कैरेक्टर’ की बात करता था ऐसे में पहले 6 महीने इस पर बात होने में ही निकल गए। फिर सरकार की ओर से इसमें बदलाव किया गया तो उषा का रजिस्ट्रेशन हो सका। वहीं इसके बाद की सबसे बड़ी दिक्कत हुई मनी लैंण्डर्स की ओर से। जिनकी सूदखोरी उषा के कारण चौपट हो गई थी। कई बार तो खुद मनी लैंण्डर्स की ओर से डॉ. जाना को धमकियां तक मिलीं। जाना को यह धमकी दी गई कि, अगर वे सेक्स वर्कर एरिया में दोबारा दिखी तो उन्हें गोली मार दी जाएगी।

उषा को—ऑपरेटिव — ‘पत्थर में दुभ’ की तरह है

ऐसी स्थिति से ऊपर उठकर, इससे लड़कर यहां की महिलाएं आज कामयाबी की शिखर को छू रही हैं। इन लोगों ने समाज की ओर से हर तरह की घृणा को सहा लेकिन अडिग रहे जिसके चलते सरकार को भी अपनी सहकारी समिति में सेक्स वर्क को भी जोड़ना पड़ा। इस दौरान सरकार ने यह माना कि, सेक्स वर्कर्स किसी अन्य पेशे की तरह ग्राहकों को सेवा प्रदान करती है और पैसा कमाती हैं। उषा जब स्थापित हो गई तो सेक्स वर्कर ज्यादा संख्या में इससे जुड़ने लगी। जो पहले यह 300 पर्सेंट ब्याज पर लेती थी वे अब यहां से सस्ते दरों पर उठा सकती थी। उषा के कारण इनका खुद का सेविंग अकाउंट भी हुआ जहां इनके रखे पैसों पर प्रॉफिट प्रसेंटेज भी मिलता है। साथ ही उषा के जरिए इन लोगों ने कर्ज लेकर अपने घर बनवाए, बच्चों को पढ़ाया लिखाया और शादी भी करवाई।

उषा वो को—ऑपरेटिव सोसायटी है जो कि फॉर बाई एंड ऑफ सेक्स वर्कर्स के सिद्धांतों पर चल रहा है और अपने 35000 सदस्यों को किसी भी आम नेशनलाइज बैंक की तरह ही बैंकिंग सुविधा प्रदान कर रहा है। वहीं उषा ने अपने दरवाजे मेल कस्टमर्स के लिए भी खोले हैं लेकिन उनके पास 9 सदस्यी बोर्ड के गठन में भाग लेने के लिए कोई वोटिंग राइट नहीं दिया गया है। उषा के काम करने का तरीका भी बिल्कुल अलग है। यह बाकी के नेशनलाइज बैंकों के विपरीत काफी सरल प्रोसेस पर एक फ्रैंडली माहौल के बीच काम करता है। इसी का नतीजा है कि, 1995 में 95 लोगों के बीच फैला यह बैंक आज 30 हजार से ज्यादा सेक्स वर्करों का भरोसेमंद बैंक है जिसका ऑथेराइज वर्किंग कैपिटल 30 लाख है और टोटल वर्किंग कैपिटल 312.95 करोड़ का है। इसका टोटल टर्न ओवर 28.15 करोड़ का है और यह 15 लाख के प्रॉफिट में है। किसी भी चीज को बनाने से ज्यादा ध्यान उसके टिके रहने पर देना होता है। उषा काम भी कर रही थी और ट्रैफिफिंग की शिकार लड़कियों को पुर्नवास का काम भी। ऐसे में फंडिग की आवश्यकता भी थी।

उषा के लोगों ने इसके लिए परिपुर में 35 एकड़ में खेती का काम शुरू किया और कई ट्रेनिंग सेंटर्स भी खोले। वहीं कंडोम परियोजना भी शुरू की। जिसके कारण उषा की अतिरिक्त आय भी होने लगी। यह आसान नहीं था, बहुत ही सीमित साधनों के बावजूद दुरबार, डॉ. जाना और उषा के वर्करों ने अपनी निर्णय के दम पर इस मुश्किल काम को भी सफल कर दिखाया। आज उषा के पासबुक की वैल्यू आइडेंटीटी कार्ड के बराबर की है इसी आधार पर इससे जुड़े सेक्स वर्करों का वोटिंग कार्ड भी बन सका। उषा जिसकी शुरूआत कभी बहुत मुश्किलों से हो सकी थी, जिसका भविष्य इस एरिया के भविष्य की तरह ही अंधकार में था आज वो सफलता की कई ऊंचाइयों को छू रहा है। यह ‘पत्थर में दुभ उगने’ की तरह है। एक ऐसी जगह जो कल तक हमारे समाज से कटी थी, जिसे लोग स्वीकार नहीं कर पाते थे, जिनका कोई सम्मान नहीं था आज उनके पास वो सबकुछ है।

Indian

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

आजाद भारत में कितना आजाद हैं महिलाओं का पहनावा

Wed Feb 26 , 2020
Share on Facebook Tweet it Pin it Email हमारे देश में महिलाएं आजाद है… वो सब करने के लिए जो वो करना चाहती है। अपने मनचाहे कपड़े पहनने के लिए, पसंद का खाना खाने के लिए, घूमने के लिए, और यहां तक की अपना मनचाहे लड़के से शादी करने के […]
Purdah System in India.