एक मॉडल जिसके चलते बेंगलुरु ने पाया कोरोना से छुटकारा

महानगर, मतलब वो जगह जो नगरों से बड़ा हो…हर चीज में…जैसे आबादी, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, आदि। मतलब कुल मिला के कहा जाए तो देश के हर क्षेत्र से ज्यादा विकसित जगह। हमारे देश में महानगरों की लिस्ट में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता आते हैं। लेकिन विकास के मामले में देश के हर शहर से अच्छे मानें जाने वाले इन महानगरों की हालत कोरोना काल में किसी पिछड़े शहर जैसी है, सिवाय एक महानगर के जिसे देश का सीलकॉन वैली कहा जाता है। यानि हम बात बेंगलुरु की बात कर रहे हैं। सिर्फ बैंगलोर ही एक महानगर है जो इस कोरोना संकट में एक महानगर के मापदंडों पर खरा उतर सका है। कोरोना संक्रमितों के मामले में भारत दुनिया के मानचित्र पर चौथे नंबर पर पहुंच चुका है।

भारत में संक्रमितों का आंकड़ा 4 लाख को छूने को है। वहीं दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में कोरोना वायरस ने तांडव मचा रखा है। देश में 15 जून तक सामने आए करीब 3.42 लाख कोविड-19 मामलों में 38 फीसदी हिस्सेदारी सिर्फ तीन महानगरों मुंबई, चेन्नई और दिल्ली की है। मुंबई के में जहां ये कोरोना ग्रसित का आंकड़ा एक लाख होने को है, तो दिल्ली में ये आंकड़ा 50 हजार पार कर गया है. जबकि चेन्नई र कोलकाता में भी आए दिन मामले बढ़ते जा रहे हैं । लेकिन इन सब कि तुलना में सिर्फ बेंगलुरु ऐसा महानगर है, जहां कोरोना वायरस का फैलाव कंट्रोल में है। यहां 15 जून तक केवल 732 मामले सामने आए हैं..

बेंगलुरु में कोरोना काबू में है

बेंगलुरु कोरोना

आबादी के मामले में बंगलुरू मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों के बराबर ही है। दिल्ली की आबादी 1.9 करोड़ है, मुंबई की आबादी 1.84करोड़ है और बंगलुरू की आबादी है 1.3 करोड़ है। लेकिन कोरोना से सिर्फ बंगलुरू ही अपने आप को बचा सका है। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में संक्रमितों के आंकड़े कम तो है ही साथ ही यहां आने वाले मामले घटते जा रहे हैं। लेकिन यहां सवाल है कैसे? तो जवाब है लॉकडाउन से….फिर सवाल आएगा की लॉकडाउन तो पूरे देश में लगा था….तो बात बस इतनी सी है कि लॉकडाउन लगना और और लागू कराने में अंतर होता है। देश भर में सही तरीके से लॉकडाउन का अगर कहीं पालन हुआ है तो बेंगलुरु में हुआ है।

बेंगलुरु में कोरोना पर कितना काबू है इसे आप इस बात से समझ सकते हैं कि 15 जून जहां मुंबई में 1,789 नए केस और दिल्ली में 1,647 मामले सामने आए वहीं, बेंगलुरु में कोविड-19 के नए मरीजों की संख्या केवल 35 थी। यानि एक एयर जहां पूरे देश में कोरोना वायरस अपने पीक पर पहुंचने को है तो वहीं बेंगलुरु में इस महामारी को सफलतापूर्वक काबू पाने में यहां की प्रशासन सफल रही है। एक्सपर्ट की मानें तो बेंगलुरु में संख्या कम होना कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि यह सब अच्छी प्लानिंग, डाटा ट्रांसपेरेंसी और प्रभावी तरीके से ट्रैकिंग किए जाने का नतीजा है।

बेंगलुरु ने करके दिखाया

जानकार मानते हैं कि बेंगलुरु में सबसे ज्यादा काम ट्रेसिंग और ट्रैकिंग पर दिया गया। बेंगलुरु का डाटा बताता है कि, यहां सबसे ज्यादा काम कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग पर हुआ। यानि कि अगर कोई कोरोना पेसेंट मिला तो उसके साथ में हर उस आदमी को ट्रेस किया जाता था। जिससे उसका कॉन्टेक्ट हुआ होगा, ट्रेसिंग के बाद उन सभी को क्वारांटाइन किया जाता है। बेंगलुरु में औसतन हर पॉजिटिव कैसे पर 47 कॉन्टेक्ट को ट्रेस किया जाता है। मतलब एक मरीज मिला तो उसके 47 कॉन्टेक्ट जिनसे वो संपर्क में आया होगा, उन्हें ढूंढ़कर क्वारांटाइन किया जाता है।

सिर्फ इतना ही नहीं, बेंगलुरु की सरकार ने एक अलग मॉडल विकसित किया, जिसके तहत सरकार ने शहर के हर मेडिकल स्टोर पर भेजने के लिए वॉलंटियर्स को भर्ती किया। ये वॉलंटियर्स इन मेडिकल की दुकानों तक जाते थे और इस बात का पता लगाते थे कि कौन से लोग सर्दी खांसी की दवाएं, पैरासिटामॉल या एंटीबायोटिक खरीद रहे हैं। इनका डाटा जुटाने के बाद सरकार इन लोगों को ट्रेस करती और इनसे इस बात की जानकारी ली जाती कि, आखिर ये लोग ये दवाएं क्यूं ले रहे हैं। जिसके बात इन सभी डाटा का बारीकी से जांच होता और सामने आए रिजल्ट के हिसाब से आगे के कदम उठाए जाते। बैंगलूरू में ये काम अभी भी जारी है। वह ये दवाएं क्यों ले रहे हैं। इसके बाद इन पर बारीकी से शोध होता और रिजल्ट के हिसाब से जरूरी कदम उठाए जाते। बैंगलूरू में ये काम अभी भी होता है।

वृहत बेंगलुरु नगर पालिका (बीबीएमपी) के कमिश्नर बी.एच. अनिल कुमार के मीडिया में आए कुछ बयानों के अनुसार ने बेंगलुरु में देशव्यापी लॉकडाउन से पहले 14 मार्च को ही लॉकडाउन लगाया जाना भी एक अहम फैसला रहा था। वे कहते हैं की देशव्यापी लॉकडाउन से पहले ही बेंगलूरु इसके लिए उठाए गए कदम से बहुत फायदा हुआ। सख्ती से लॉकडाउन किए जाने से संक्रमण पर नियंत्रण में मदद मिली, इसने प्राइमरी और सेकेंडरी कांटैक्ट को ट्रेस करने में भी मदद हुई। जिसके कारण कम्यूनिटी ट्रांसमिशन के चांसेज घट गए।

वे कहते हैं कि हमें जैसे ही ज्यादा आबादी वाले इलाकों में एक भी पॉजीटिव केस का पता चलता, हम उसकी पहचान करके उसके घेरा बंदी कर देते, वहां पर आने और जाने के सभी रास्ते बंद किए जाते, केवल आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति के लिए एक रास्ता खोला जाता। वे बताते हैं कि हर पहले मामले में पहले और दूसरे कांटैक्ट को क्वारेंटाइन सेंटर में डालने से कोरोना फैलाव को कम करने में काफी मदद मिली।

हर एक केस को किया गया ट्रेस

बेंगलुरु कोरोना

बेंगलुरु में पॉजीटिव केस की संख्या कम इसलिए है क्योंकि यहां शुरू से ही शहर की सिविक बॉडी ने हर एक केस को ट्रेस करने और किसी केस को अनट्रेस न छोड़ने की रणनीति पर काम किया। इस रणनीति मामलों की पहचान, उनके कांटैक्ट तत्काल ट्रेस करना, हर मामले का आकलन करना और महामारी के संक्रमण की स्थिति को समझने के लिए सिमुलेशन मॉडल का इस्तेमाल करना शामिल है।

इसके आलावा नगर प्रशासन ने क्वारेंटाइन लोगों, खासकर घर में रहने वालों पर भी बड़ी बारीक नजर बनाए रखी है। मसलन शहर के एयरपोर्ट्स पर सख्त स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल, जिसमें कई तरह के सवाल होते हैं। दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया है के बाद भी, लोगों से लगातार संपर्क बनाए रखना, जिसके तहत अमूमन तीन हफ्ते में एक बार स्वास्थ्य अधिकारी का फोन आना और स्क्रीनिंग की प्रक्रिया से गुजरे लोगों का हाल चाल जानना, जो लोग क्वारांटीन होते उनकी सेहत और बॉडी टेंपरेचर का हर रोज जानकारी लेना आदि।

कर्नाटका कोविड-19 वार रूम के प्रभारी मुंशी मुदगिल की मानें तो कर्नाटक में संक्रमण की चपेट में आ सकने वाले लोगों की पहचान, उनके आइसोलेशन और क्वारंटाइन किए जानें का मॉडल बाकी राज्यों की तुलना में काफी प्रभावी ढंग से लागू हुआ। इसी के कारण जिन इलाकों में संक्रमण का विस्फोट होने का खतरा है या नजर आ रहे हैं। वहां स्थिति को नियंत्रित करने में सफलता मिल रही है।

इसके आलावा बीबीएमपी ने हाल ही एक नई रणनीति बनाई है जिसे एंटी-कॉटैक्ट ट्रेसिंग नाम दिया गया है, जिसके तहत उन क्लस्टर का पता लगाया जा रहा है, जहां पर संक्रमण के तेजी से फैलने की गुंजाइश है। इसके तहत  भीड़भाड़ वाली जगहों से लिए गए नमूनों को आवासीय इलाकों से लिए गए नमूनों के साथ मिलाकर संभावित क्लस्टर के बारे में जानकारी जुटाई जाती है।

टेक्नोलॉजी का अच्छा इस्तेमाल

बेंगलुरु कोरोना

बेंगलुरु की सफलता का एक राज टेक्नोलॉजी का अच्छा इस्तेमाल भी है। बेंगलुरु में कोविड-19 मरीजों को ट्रैक और ट्रेस करने और होम क्वारंटाइन वालों पर नजर रखने में टेक्नोलॉजी और इनोवेटिव एप्लीकेशन का इस्तेमाल किया गया। शहर की सिविक बॉडी ने कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के संपर्क में सभी लोगों की जानकारी का रिकॉर्ड रखने वाला एक कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग मोबाइल एप जारी किया था, जिसके निचले स्तर पर तैनात लोग कॉन्टेक्ट की पहचान करके उसे तत्काल क्वारंटाइन करा सकते हैं।

वहीं क्वारंटाइन में रहने वालों की निगरानी के लिए सरकार ने क्वारंटाइन वाच एप भी लांच किया। जिसके जरिए क्वारंटाइन में रह रहे लोगों को ये ऐप डाउनलोड कराया जाता है और उनसे हर दो घंटे पर अपनी सेल्फी अपलोड करने को कहा जाता है। जीपीएस लोकेशन और फोटोग्राफ के विश्लेषण के आधार पर बैकएंड की टीम यह सुनिश्चित करती है कि कहीं कोई प्रक्रिया का उल्लंघन तो नहीं कर रहा है।  राज्य सरकार ने एक कोरोना वाच एप भी लॉन्च किया है। जिससे ये जानकारी मिलती है कि, कोविड-19 मरीज पॉजीटिव पाए जाने से 14 दिन पहले किन-किन जगहों पर गया था। जिनके पास यह एप है वो उन जगहों से दूर रह सकते हैं जो संभावित हॉटस्पाट हो सकते हैं।

वहीं टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर यहां के डॉक्टरों  के लिए भारत का पहला ऑनलाइन ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाया गया। जिसमें 25000 से ज्यादा डॉक्टरों और फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों को कोरोना वायरस से लड़ने का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। वहीं महामारी से निपटने के लिए बनाई गई 17 टास्क फोर्स में आपसी समन्वय को लेकर कर्नाटक राज्य आपदा प्रबंधन अधिकरण (केएसडीएमए) के तहत एक डिसीज सर्विलांस टीम का गठन किया है, इसके लिए तीन टूल विकसित किए हैं, कंसॉलिडेटेड कोविड-19 पोर्टल, रियल टाइम डाटा कलेक्शन और मॉनिटरिंग तथा क्राउड सोर्सिंग टूल। पोर्टल के डैशबोर्ड पर महामारी से जुड़ी सभी जानकारियां आंकड़ों, फेक न्यूज बस्टर, हेल्पलाइन नंबर, स्टेट वार रूम के विश्लेषण के तौर पर एक जगह पर ही मिल जाती है।

टेक्नोलॉजी के जरिए ग्रामीण स्तर तक की जानकारी प्राप्त की जा रही है और इसका लाभ पूरे राज्य में मिल रहा है। बेंगलूरु के लिए प्लस प्वाइंट है उसकी बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था। यहां शुरू से ही टेस्ट ज्यादा हुए और मरीजों को सही सुविधाएं दी गईं। अगर बैंगलोर मॉडल पर देश के बाकी महानगरों ने शुरू से काम किया होता तो शायद कोरोना भारत में उस स्तर ता न पहुंचता जहां ये अभी है, लेकिन वक़्त अभी भी है। इस मॉडल को अप्लाई कर महानगरों समेत देश के हर छोटे बड़े शहरों को अब भी सुरक्षित किया जा सकता है।

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