एक पुरानी परंपरा को पुर्नजीवित करने की कहानी

आदमी तू भी है, आदमी मैं भी हूं।

यूं तो हर आदमी आदमी है मगर

आदमी क्या है? कुछ भी नहीं

आदमी नहीं, गर आदमी के लिए

आपने ये जो लाइनें सुनी/पढ़ीं इनके मतलब भी आप समझ ही गए होंगे। लेकिन मतलब समझने में और उसे अपनी रोजमर्रा वाली लाइफ में उतारने के लिए अंतर है। ऊपर की ये लाइनें हमने जिनके लिए लिखीं हैं वो समाज हमारी भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा है लेकिन तेज भागती जिंदगी और एक-तरफा विकास के कारण यह समाज पिछड़ता चला गया। हर समाज में एक कुरीति होती है और वो ये कि, समाज का जो वर्ग आगे बढ़ गया होता है वो पीछे छूटे हुए समाज से अपने सारे बंधन तोड़ लेना चाहता है। वो समझता है कि, मैं सही हूं बाकी सब गलत, उसके अंदर वो भावना आ जाती है कि, यह समाज जो पीछे छूट गया है वो इस धरती पर है ही क्यों? उसकी जरूरत क्या है? वो समझता है कि, इस वर्ग के लोगों को पैदा ही नहीं होना चाहिए था। लेकिन वो इस वर्ग की अहमियत नहीं समझता, वो इनकी परंपरा को नहीं पहचान पाता और इसी कारण से वो खुद भी अपनी जड़ों से दूर हो जाता है।

Halma की परंपरा

Halma की परंपरा

भील आबादी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। यह वो आदिवासी सामाज है जो मध्यप्रदेश के एक कोने में राजस्थान और गुजरात से सटे हुए इलाके में रहती है। पथरीली जमीन में रहने वाले ये लोग इस जगह पर खेती करते हैं और गुजर—बसर करते हैं। लेकिन अंधाधुंध विकास की रफ्तार की मार ने क्लाइमेट को बदला और यहां मौसम की अलग मार पड़ी। खेती किफायती वाला काम नहीं रहीं, तो जंगल के ये लोग अपना घर छोड़ शहर मजदूरी करने को जाने के लिए मजबूर हुए। शहर का वो समाज जिसको इनके बारे में कोई चिंता नहीं है वो समाज जब इन्हें देखता है तो वो यही सोचता है कि, आखिर ये लोग एगजिस्ट ही क्यों करते हैं? हमारे समाज का यह वर्ग इनसे बात तक नहीं करना चाहता। यह सोचता है कि, ये समाज निकम्मा है, बेकार है और शराब पीने में जिंदगी बर्बाद करने वाला है इसलिए वो पिछड़ा है और ऐसे लोगों की दुनिया में जरूरत नहीं है!

दूसरे वर्ग की ओर से मिल रही उपेक्षाओं ने इस समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया कभी कभी हरी—भरी रहीं उनकी जमीनें अब सालों तक बंजर रहने लगीं, जिसके कारण उनके समाज के लोगों को गांव छोड़ शहर की ओर जाना पड़ा? इन सवालों का जवाब इस समुदाय के लोगों को मिला अपनी पुरानी रीति—रिवाज और परंपराओं में। भीलों ने देखा कि, जो खराब गुण उनके अंदर हैं वो अवगुण तो शहरी और विकसित लोगों के अंदर भी हैं। उन्हें अहसास हुआ कि, हम अपनी संस्कृति और अपने रिवाजों को अपनाने में अब कतराने लगे हैं, हम खुद ही उनसे पीछा छुड़ाने लगे हैं और इसी के कारण हमारी जड़ें खत्म होती जा रही हैं। इसी चर्चा के दौरान भील लोगों ने देखा कि, सबसे बड़ी समस्या है पानी। पानी की इस समस्या से कैसे निपटा जाए? यह एक बड़ा सवाल उनके सामने था। यह वह समस्या थी जो भीलों के पलायन का कारण थी।

इस दौरान गंगा का उदहारण दिया गया कि, कैसे भगवान शिव की तपस्या कर भगीरथ ने धरती पर गंगा को उतारा था और धरती फिर से हरी—भरी बन गई। भील लोगों ने कहा कि आज उनके समाज के हर व्यक्ति को भगीरथी बनने की जरूरत है। लेकिन फिर एक और समस्या खड़ी हुई कि आखिर कैसे भील समाज अपने हर एक भगीरथी को एक साथ लेकर आएगा? कोई क्यों शहरों में अपनी मजदूरी छोड़कर, अपना काम छोड़कर उनके साथ आएगा? और इन सभी सवालों का एक जवाब था एक पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करना। भीलों को एहसास हुआ कि, उनकी हर प्रॉब्लम का निदान उनकी पुरानी परंपरा में है जो उनके बड़े—बुजुर्ग अपनाया करते थे। 

Halma की परंपरा और परमार्थ का काम

भीलों को याद आया कि, उनके लोग किसी दूसरे कारण के लिए एकजुट हो या न हों लेकिन वो एक काम के लिए हमेशा एकजुट होकर खड़े होंगे, इसके लिए वे दुनिया का हर काम छोड़ देंगे और यह काम है ‘हलमा’। लेकिन यह हलमा है क्या? शायद ही हिन्दुस्तान के दूसरे किसी कोने में रहने वाले लोग हलमे के बारे में जानते हो। दरअसल हलमा भील आदिवासियों की एक पुरानी परंपरा है। ऐसा कहा जाता है कि, हलमा तब बुलाया जाता है जब कोई एक आदमी किसी काम को करने के लिए अपनी सारी ताकत लगाने के बाद भी सफल नहीं हो पाता। यानि वो हर तरकीब,  ताकत या धन सब लगाने के बाद भी किसी काम को करने में सफल नहीं हो पाता तो वो हलमा बुलाता हैं। हलमा का मतलब है लोगों को एक काम के लिए एक साथ लेकर आना। यह परमार्थ का काम होता है, यानि किसी एक काम को करने के लिए हर कोई बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी लाभ के अपना सब काम—बार छोड़ कर साथ आते हैं।

हलमा को फिर से पुर्नजीवित किया गया 2009 में, जब मध्यप्रदेश के झाबुआ में ‘शिवजी का हलमा’ हुआ। इसकी तैयारी के लिए लोग अपने घरों से बाहर निकले और 15 दिनों तक यात्राएं की, करीब 500 गांवों तक पहुंचे और लोगों को हलमा के बारे में बताया और एक साथ फिर से आने को कहा। मेहनत रंग लाई। 2009 के इस कार्यक्रम में 800 लोग पहुंचे, 2010 में 1600, 2011 में पहुंचे 10,000 लोग, 2012, 2013, 2014 और अब 2020 में यह संख्या काफी ज्यादा हो गई है। लोगों का यह जनसमूह हर साल हाथी पावा की पहाड़ी पर जुटता है और करता है ग्लोबल वार्मिग के खतरे से निपटने की तैयारी।

ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ हजारों का जनसमूह

2020 में जब ‘शिवजी का हलमा’ आयोजित हुआ तो झाबुआ में हजारों की संख्या में आदिवासियों का समूह अपना काम छोड़ हाथीपावा पहाड़ी पर पहुंचा और अपने फावड़े और गैती की मदद से पर चालीस हजार जल संरचनाओं का निर्माण कर दिया है। यह जल संरचनाएं सालों भर पानी से भरेंगी और इस क्षेत्र में हरियाली छाई रहेगी। भील लोगों ने अपनी पुरानी परंपराओं को जीवित किया और यह साबित किया कि, वे बेकार नहीं बल्कि मेहनतकश लोग हैं। वे गैती को सम्मान से लेकर चलते है और मानते हैं कि, गैती उनका पालक है।

हमने और आपने लोगों को ग्लोबल वार्मिंग के बारे में बड़ी—बड़ी बातें करते हुए सुना होगा लेकिन शायद हीकिसी को बाहर निकल कर कुछ करते हुए देखा हो, लेकिन भील समाज के लोग बिना किसी स्वार्थ के देश के हर कोने से हलमे के आह्वान पर झाबुआ पहुंचते हैं और धरती को बचाने के लिए अपना श्रम देते हैं। यह परामार्थ की भावना उनके अंदर उनकी परंपरा की बदौलत ही है जो शायद किसी डेवलप्ड सीटी के संस्थान मे देखने को न मिले, यहीं कारण है कि आईआईटी और आईआईएम के बच्चें भी इनके इस हलमे को देखने के लिए और सीखने के लिए पहुंचते हैं।

भील समाज में ‘हलमा’ यानि परामार्थ के लिए किया जानेवाला श्रम उनके प्रति लोगों के अंदर आदर का भाव तो पैदा करता ही है लेकिन साथ में यह भी संदेश देता है कि हमारी भारतीय परंपरा में इस धरती को मां माना गया है और मां सबकी होती है उसके लिए हर कोई बराबर होता है, अगर एक ने गलती की है तो सजा दोनों को भुगतनी पड़ेगी, किसी एक के नहीं रहने से धरती सुंदर नहीं बन जाएगी, हलमे की परंपरा परामार्थ के लिए कहती है कि बिना स्वार्थ के एक दूसरे के लिए जीना।

तभी तो हम कह सकेंगे

आदमी क्या है? बहुत कुछ है 

आदमी, गर आदमी के लिए   

Indian

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