एक नायाब कलाकार जो जिंदगी के पर मुहाने रंगों से भर रही है

रंग भरी जिंदगी किसे खूबसूरत नहीं लगती और शायद, खूबसूरत जिंदगी के लिए एक इंसान आए दिन इतनी मेहनत करता रहता है. ताकि आने वाला हर एक दिन संजीदगी भरा हो. खैर, कुछ लोग हैं जो अपने सपनों में रंग भरते हैं, कुछ लोग होते हैं जो कैनवस से लेकर हर चीज रंग देने के ख्याल अपने अंदर संजोते हैं. कुछ ऐसी ही जिंदगी उसकी भी है. जिसने मानों दुनिया को रंगीन बनाने के लिए कुछ समय पहले एक ख्बाव सजाया, फिर उन्हीं रंगों से अपना आयाम बना डाला. यही नहीं इसके साथ-साथ उसकी कामयाबी और हुनर ने भी उन रंगों में कुछ इस तरह मेल किया कि, आज जो भी उसे उस सांचें में देखता है. उसका दीवाना हो जाता है.

सपनों को उड़ान देने वाली दीपाली सिन्हा

किसी ने सही कहा है…की अगर कोई इंसान अपने अंदर कुछ करने की ठान ले तो शायद, दुनिया में कुछ नामुमकिन सा नहीं है. कुछ इसी तरह की हकीकत जुड़ी है, दीपाली सिन्हा से, एक ऐसी महिला जिन्होंने उम्र के उस पड़ाव में एक सपना देखा और फिर उस सपने में इस तरह रम गई की आज बुलंदियां उनके दर पर भटक रही है.

40 की उम्र में जब दीपाली सिन्हा ने अपने पैशन को प्रोफेसन बनाने का सपना सजाया था, उस समय शायद ही उनको ये मालूम रहा हो की ये काम उनकी पहचान बन जाएगा. क्योंकि लीक से हटकर काम करना समाज में रह रहे इक्का-दुक्का लोग ही चाहते हैं. 

दीपाली सिन्हा

दिल्ली की इंदिरापुरम की रहने वाली दीपाली सिन्हा ने रंगों की बारीकियों को कुछ इस तरह से समझा की आज उनकी कला से ही लोग उनसे मुखातिब होते हैं. हर कोई जानता है की दक्षिण के राज्य केरल में कथकली ऐसी नृत्य शैली है. जिसके बारे में हर इंसान ने सुना तो होगा, लेकिन उस नृत्य को करना सभी के बस की बात नहीं है. वहीं इस नृत्य को करने से पहले इस नृत्य की तैयारी या यूं कहें मेकअप में भी कुछ यही हाल होता है. क्योंकि कथकली का मेकअप अच्छे-अच्छों के बस की बात नहीं है और कथकली करने वाले आर्टिस्ट को ‘चुट्टीकारन’ कहा जाता है.

उत्तर भारत की पहली मेकअप आर्टिस्ट दीपाली सिन्हा

दीपाली सिन्हा

जहाँ हमारे समाज में कहा जाता है की कुछ सीखने की कोई उम्र नहीं होती, वहीं दूसरी तरफ ये भी कहा जाता है कि, किसी भी काम की शुरूवात करने के दौरान उम्र महज एक नंबर भर है. तभी तो आज दीपाली सिन्हा उत्तर भारत की पहली कथकली मेकअप आर्टिस्ट ‘चुट्टीकारन’ बन गई हैं. जाहिर है जब भी कोई इंसान अपनी लीक से हटकर काम करता है तो उसके सामने कई तरह की चुनौतियां आती हैं. कुछ इसी तरह ही दीपाली सिन्हा ने उम्र के हर पड़ाव में माँ, बहन, बेटी, बहू और यहाँ तक की एक सास और दोस्त का भी किरदार निभाया. जाहिर है, ऐसा तो हर एक महिला करती है. लेकिन इन सभी के साथ अपने सपनों को वो मुकाम दे पाने की हिम्मत गिने चुने में होती है.

मध्यप्रदेश के एक छोटे से गांव से ताल्लुकात रखने वाली दीपाली का लगाव बचपन से ही कला और संस्कृति में रहा था. हालांकि इस दौर न तो ये कला दीपाली की पढ़ाई के बीच आई और न ही दीपाली ने पढ़ाई बंद की. दीपाली ने जहाँ एमएससी की पढ़ाई फिजिक्स से पूरी की तो वहीं दूसरी तरफ उसके बाद उन्होंने एमसीए किया. उसके बाद एनआईटी में बतौर कम्प्यूटर इंजीनियर के तौर पर काम करने की शुरूवात की थी. इस बीच दीपाली की शादी करा दी गई और जल्द ही दीपाली ग्रहणी बन गई. क्योंकि जहाँ परिवार की जिम्मेदार थी तो वहीं दूसरी तरफ दीपाली ने नौकरी छोड़ दी.

हालांकि कला और संस्कृति का शौक दीपाली के मन से कभी गया ही नहीं था, यही वजह थी की कुछ अलग करने की चाहत ने दीपाली को मेकअप आर्टिस्ट बनने का मन बनाया. लेकिन इस बीच बच्चों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारी और बढ़ती उम्र दीपाली की चिंता का विषय बन गई थी. लेकिन साल 2011 में दीपाली ने मेकअप आर्टिस्ट बनने की ठान दिल्ली में इंटरनेशल सेंटर फॉर कथकली को ज्वाइन कर लिया था और लगातार दो साल तक दीपाली सिन्हा ने मेकअप आर्टिस्ट का काम सीखा. इस दौरान उन्होंने अपने परिवार का बाखूबी ख्याल रखा.

अगर दुनिया की बात करें तो केरल में होने वाला कथकली नृत्य ही एक ऐसी नृत्य कला है. जो लगभग 300 सालों से ज्यादा पुरानी कला है. कथकली डांस के लिए जहाँ नृतक को अपने चेहरे, आंखों के हाव-भाव पर सबसे ज्यादा जोर देना होता है, वहीं दूसरी तरफ इस डांस को करने की तैयारी यानि की मेकअप भी अहम रोल निभाता है और इस कला को ही ‘चुट्टीकारन’ कहा जाता है.

दीपाली सिन्हा को मानें तो, “कथकली का मेकअप करना एक अनोखा हुनर है, इसमें वो जादू होता है जो किसी भी चरित्र को बदल सकता है. दीपाली कहती हैं कि, कथकली के लिए किसी भी किरदार को तैयार करने में लगभग 3 से 4 घंटे तक का समय लगता है. इस दौरान मेकअप के सभी रंग दीपाली खुद ही अपने घर पर बनाती हैं.

आज यही वजह है कि, कला के क्षेत्र में दीपाली सिन्हा ने वो मुकाम हासिल कर लिया है. जिसके चलते अब तक दीपाली सिन्हा को अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. दीपाली को जहां साल 2015 में भारत की सर्वश्रेष्ठ चुट्टी आर्टिस्ट का खिताब दिया गया था, वहीं अपने हुनर से अपना नाम बनाने वाली दीपाली को कला एवं संस्कृति के लिए काम करने वाले भारतीय संस्था ब्रजभूमि फाउंडेशन ने उन्हें सबसे प्रभावशील 51 महिलाओं में चुना है.

कला के साथ पर्यावरण बचाती दीपाली सिन्हा

दीपाली सिन्हा

आज दीपाली जहां एक तरफ अपनी कला और संस्कृति के लिए काम कर रही हैं, वहीं लोगों को इससे जोड़ने के लिए भी दीपाली अनोखा तरीका अपना रही हैं. जिसके चलते दीपाली ने एक स्कॉलरशिप “शुभदीप” की शुरूवात की है. जोकि लोगों को इस कला में बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है. आज के समय में दीपाली इस कला को लेकर अलग-अलग राज्यों में इसका आयोजन भी करती हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे जोड़ा जा सके. यही नहीं ‘चुट्टीकारन’ कला के साथ-साथ दीपाली इन दिनों कथकली नृत्य भी सीख रही हैं.

साथ ही कला और संस्कृति के साथ-साथ दीपाली सिन्हा प्रकृति से भी खासा लगाव रखती हैं. जिसके चलते वो लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का काम कर रही हैं. दीपाली सिन्हा ने एक अलग प्राइवेट संस्था वेस्ट मैनेजमैंट रीसायक्लिंग सोसाइटी (डब्लूमार्स) बनाई है, इस संस्था का मुख्य मकसद देश में लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ प्लास्टिक वेस्ट से छुटकारा पाने के तरीकें बताना है.

इस संस्था को बनाने के मकसद की बात करें तो दीपाली जी कहती हैं कि, “पर्यावरण की सुरक्षा देश में रह रहे, हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है. जिसको बचाने के लिए हर इंसान को आगे आना चाहिए. साथ ही अलग कदम उठाना चाहिए. ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी जी सके. यही वजह है कि, दीपाली के कामों को देखते हुए ‘कचरा प्रबंधन’ के लिए कालिन्दी ऑवार्ड से सम्मानित किया गया है.

जाहिर है, समाज में वो लोग गिने चुने ही हैं, जो समाज को बेहतर करने और समाज को किसी अलग नजरिए में ढ़ालने की कोशिश करते हैं. कुछ इसी तरह ही दीपाली सिन्हा, जो समाज के उन हर एक पहुलओं पर खरी उतरती हैं, तभी तो दीपाली सिन्हा आज हमारी भारतीयता की अनोखी मिसाल हैं.

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