एक ऐसा गांव जहां के लोग दो देशों के होते हैं, नागरिक

सीमाऐं कितना कुछ बना और बिगाड़ देती हैं. चाहे बात भारत-पाकिस्तान विभाजन की हो, या फिर देश दुनिया के किसी भी कोने की क्यों न हो. जब भी किसी भी देश के बीच विभाजन होता है तो, उसे वो सीमाऐं ही होती हैं. जो पुख्ता करती हैं. चाहे बात भारत-पाक की हो, या भारत-चीन इनमें हमेशा से सीमाओं को लेकर बात-विवाद रहा है. लेकिन भारत में ही एक ऐसी भी जगह है, जहां के लोग बिना किसी वीजा बिना किसी पासपोर्ट एक दूसरे देश में चले जाते हैं. यानि की अगर हम ये कहें कि, यहां के लोग खाना किसी देश में खाते हैं और सोने किसी और देश में जाते हैं. तो ये कहना गलत नहीं होगा.

भारत के नागालैंड की राजधानी कोहिमा से 389 किमी दूर नॉर्थ ईस्ट में बसा ये एक गांव लोंगवा, एक ऐसा गांव है. जिसका आधा हिस्सा भारत में तो आधा हिस्सा पड़ोसी देश म्यांमार में पड़ता है. इसमें भी खास बात ये है कि, यहां लोकतंत्र के साथ-साथ राजा भी रहते हैं. जिसके घर के बीचों बीच से होकर गुजरती हैं, दोनों देशों की सीमाऐं.

दुनिया के नजरिए से भी खास Longwa Village

Longwa Village

लोंगवा गांव में कोन्याक जनजाति रहती है. जोकि भारत के साथ-साथ म्यांमार में भी रहती है. लोंगवा गांव के राजा का नाम अंग नगोवांग हैं, जिनके अधीन लोंगवा के साथ-साथ कुल 75 गांव आते हैं. इन गांवों में कुछ गांव जहां भारत के हिस्से में हैं तो कुछ गांव म्यांमार जबकि कुछ अरुणाचल प्रदेश में हैं. हालांकि इन सबमें सबसे ज्यादा दिलचस्प बात ये है कि, यहां के राजा के घर का हिस्सा, जहां राजा खाना तो भारत में खाता है, हालांकि सोने के लिए म्यांमार में जाता है. राजा होने के नाते ही, नगोवांग का परिवार भी काफी बड़ा है, क्योंकि यहां के राजाओं को एक से अधिक बीवियां रखने की छूट होती है. यही वजह है कि, नगोवांग के पास 60 बीवियां हैं.

लोंगवा गांव के लोगों भले ही दो देशों के बीच रहते हो, हालांकि उन्हें इस बात से बिल्कुल भी परेशानी है. जिस समय यहां की सीमाऐं निर्धारित की जा रही थी. उस समय इस गांव को दो हिस्सों में बांटने को लेकर मतभेद के चलते, अधिकारियों ने यहां की सीमा रेखा गांव के बीचों-बीच कर दी थी. यही वजह है कि, यहां का राजा भारत में खाना तो खाता है, हालांकि सोने के लिए उन्हें म्यामांर में जाना पड़ता है. क्योंकि राजा का घर गांव के बीचों-बीच है.

Longwa Village के लोगों को दोहरी नागरिकता

Longwa Village

इस गांव के बीचों बीच एक बोर्ड भी लगा हुआ है. जिसमें एक तरफ म्यांमार की भाषा में बर्मीज तो एक तरफ हिंदी में भारत लिखा हुआ है. वहीं इस गांव के नागरिकों को म्यांमार जानें के लिए किसी भी तरह के वीजा की जरूरत नहीं पड़ती. क्योंकि दो देशों के बीच बसे इस गांव के लोगों को दोनों ही देशों ने नागरिकता दी हुई है.

लोंगवा गांव की जनजाति, हेड हंटर्स

साल 1940 तक लोंगवा की कोन्याक जनजाति को, हेड हंटर्स के नाम से जाना जाता था. क्योंकि यहां कबीलों को अपनी ताकत दिखाने के लिए ये लोग अपने दुश्मनों का सिर काट देते थे और उसे अपने घरों में टांग दिया करते थे. हालांकि साल 1948 के बाद से हेड हंट पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया. साथ ही लोगों के घरों में टंगे उन लोगों के सिर के कंकाल को दफना दिया गया. जो इन कबीलों ने अपने घर लगाए थे. यही वजह रही कि, साल 1960 के बाद से अब तक यहां से कभी भी हेड हंट की कोई खबर नहीं आई. यहां की जनजाति नागमिस भाषा का प्रयोग करती है. जोकि नागा और आसामी से मिलकर बनी है.

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