एक अफ्रीकी ‘हब्शी’ जिसने मुगलों की नाक में दम कर दिया

भारतीय इतिहास को जितना हम खंगालते हैं यह उतना ही रोचक होता जाता है। हर बार इसे पढ़ने पर कई ऐसी नई जानकारियां बाहर निकलकर आती हैं जिसे हम और आप जानकर हैरान रह जाते हैं। इतिहास के इन्हीं पन्नों में से आज हम एक ऐसी ही कहानी के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जो उस समय की है, जब मराठा भी मुगलों के गुणगाण गाते थे, लेकिन एक अफ्रीकी ‘हब्शी’ ने मुगलों को उनकी हदों में समेट दिया था। यह ‘हब्शी’ बड़ी दूरी तय करके भारत पहुंचा था और भारत में उसे वह मौका मिला जो शायद दुनिया के किसी और देश में उसे नहीं मिलता और वह मौका था सुल्तान बनने का। यह अफ्रीकी मूल का महान योद्धा था ‘मलिक अंबर’।

पहले हब्शी को समझिए

‘हब्शी’ यह शब्द भारत में आमतौर पर लोकल भाषाओं में सुनने को मिलता है। लेकिन इसका मतलब क्या होता है? आज के दौर में हब्शी का मतलब क्या है? दरअसल, हब्शी शब्द का मतलब हमारे देश में दो मुख्य अर्थो में इस्तेमाल होता है। पहला ‘खाने के लिए ललाए यानि पेटू आदमी के लिए और दूसरा काले रंग वाले व्यक्ति के लिए। खासतौर पर अफ्रीकी मूल के नागरिक जो भारत में रहते हैं, उन्हें इस नाम से कई लोग चिढ़ाते हैं आज हब्शी का जुड़ाव काले रंग से है और काले रंग को नीच समझा जाता है या अपराधिक प्रवृति का मान लिया जाता है। लोगों को आपने कहते हुए सुना होगा कि, ये तो हब्शी हैं, कुछ भी खा जाते हैं। इस एक वाक्य से आप इन लोगों के बारे में हमारे समाज की सोच को समझ सकते हैं। लेकिन सामाज की यह सोच बनी कैसे है? भारत में ‘हब्शी’ आदमी का पहला स्ट्रॉंग रूप देखने को मिलता है रजिया सुल्तान के समय में।

काफी पुरानी बात है, 13वीं शताब्दी के तीसरे दशक में रजिया सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर पहुंची थीं। लेकिन कई लोग थे जो एक महिला को सुल्तान के रूप में नहीं देख सकते थे। ऐसे में उस समय एक अफ़वाह फैली थी। सुल्तान और उनके अफ्रीकी मूल के सिपहसालार जमालुद्दीन याकूत के बीच प्रेमसंबंध की। हालांकि, इस बात की सच्चाई को कोई भी पूरी तरह नहीं जानता था लेकिन इसी अफ़वाह के जरिए एक तीर से दो निशाने लगाए गए। पहला महिला शासक को गद्दी से हटाया गया और दूसरा उनके ताकतवर सिपहसालार को एक धोखेबाज की तरह सबके सामने लाया गया ताकि ये साबित किया जा सके कि, उसने शासक के साथ अनैतिक संबंध बनाए। यहीं से ‘हब्शी’ के खिलाफ लोगों में जहर के बीज पड़ गए।

हब्शी,Malik Ambar

लेकिन ऐसे में यह सवाल उठता है कि, आखिर इन काले लोगों को हब्शी क्यों कहा जाता था? और ये लोग थे कौन? तो इसका जवाब अफ्रीकी इतिहास में मिलता है। दरअसल, मेडाइवल पीरियड में उत्तर पूर्व अफ्रीका का एक प्रायद्वीप था, जिसे ‘हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका’ के बेहद ख़ास स्थान के रूप में जाना जाता था। यह जगह अरब और यूरोप के उन लोगों की पसंदीदा थी जो गुलामों को खरीदते और बेचते थे। इसी जगह को अरब लोग ‘अल-हबश’ कहा करते और वहां रहने वाले लोगों को ‘हब्शी’ या ‘अबीसीनियन’ कहा जाता था। इसलिए जब ये लोग गुलाम या खरीददार के रूप में भारत आए, तो उन्हें ‘हब्शी’ कहा जाने लगा। धीरे-धीरे वक़्त आगे बढ़ता गया और इस ‘हब्शी’ शब्द को भारत में काले रंग के लोगों से जोड़ दिया गया।

जब भारत में आने वाले हब्शी लोगों की किस्मत चमकी

जब भारत में ये ‘हब्शी’ लोग पहुंचे तो इनकी किस्मत चमकी, कल तक गुलामों की जिंदगी बिताने वाले ये लोग भारत में राज करने वाले बन गए। भारत में गुलाम वंश का राज रहा। जो पहला मुस्लिम राजवंश था। यह इस लिए संभव हुआ क्योंकि इस दौर के इस्लाम में एक समतावादी व्यवस्था थी कि, अगर गुलाम में भी काबिलियत है, तो वो भी तरक्की कर सकता है आगे बढ़ सकता है। यह परंपरा मुगल काल के दौर में उन राज्यों में भी जारी रही जहां मुगल नहीं पहुंच सके और इसी कारण दक्कन में एक ऐसे ‘हब्शी’ मूल के गुलाम को सत्ता के शिखर पर पहुंचने का मौका मिला जिसने मुगलों को दक्कन में घुसने तक नहीं दिया।

कौन था Malik Ambar और कैसे पहुंचा वो भारत

भारत में रहे सभी हब्शियों में सबसे महान मलिक अंबर को माना जाता है, जिसने भारत में अपना एक अलग इतिहास लिखा। वो एक स्लेव से किंग मेकर तक की भूमिका में हमें इतिहास के पन्नों में दिखाई देता है। मलिक अंबर का इतिहास अफ्रिका से मिडिल ईस्ट और फिर वहां से भारत तक का है। साथ ही उनकी जिंदगी के इतिहास से हमें उस समय के स्लेवरी सिस्टम का एक अलग रूप भी देखने को मिलता है जहां स्लेव को उसके मालिक के द्वारा पढ़ने—लिखने और दुनिया के हर चीज़ को एक्सप्लोर करने की इजाजत मिलती है।

मलिक अंबर की कहानी 1548 में इथोपिया में उसके जन्म से शुरू होती है। उस समय उसका नाम ‘चापू’ था। ये वो दौर था जब इथोपिया का माहौल काफी हिंसक हो चला था। ऐसे में यहां राज करने वाली सोलोमोनिक ईसाई सल्तनत और मुस्लिम शासकों ने यहां के नॉन एब्राहमिक लोगों को अपने अधीन करने की कोशिश की और इस तरह से स्लेवरी जोरों पर होने लगी। यहां के ‘हब्शी’ लोगों को दुनिया के कई कोनों में लड़ाइयां लड़ने के लिए या कोई दूसरा काम करने के लिए गुलामों के रूप में बड़ी संख्या में बेचा गया। ‘चापू’ को भी 12 साल की उम्र में अरब के व्यापारियों के द्वारा पकड़ लिया गया और उसे यमन के बाजार में बेचने के लिए ले जाया गया। जहां से उसे बगदाद के एक मर्चेंट कासिम ने खरीद लिया और उसे अपने साथ बगदाद ले गया। कासिम ने चापू का धर्म परिवर्तन करवाया और उसे एक नया नाम मिला ‘अंबर’। कासिम ने अंबर को पढ़ना लिखना और अपने काम का लेखा जोखा रखने की तालिम दी।   

यहां से दस साल के बाद 1571 में अंबर अपने मालिक के संग समुद्री रास्ते से होता हुआ भारत के वेस्टर्न कोस्ट यानि की दक्कन के पठार में पहुंचा। यह वो जगह थी जहां से अंबर को अपनी जिंदगी का इतिहास लिखना था। वो इतिहास जो उसका अपना बनाया हुआ था। दक्कन में उस समय कई सारे राजाओं के बीच लड़ाइयां होती रहती थी। लेकिन भारत में एक अनूठापन था, यहां हर धर्म के लोग थे। दक्कन में उस समय 5 से ज्यादा किंगडम थे। अहमद नगर, बीजापुर, बिदर, गोलकोंडा, बहमानी और बेरार मुख्य थे। जहां के शासक मुस्लिम थे और ज्यादात्तर आबादी हिन्दू मराठा थी। इनके अलावा यहां हिन्दू तुर्क, परसियन और कुछ वेस्ट कंपनियों के लोग थे। अस्थिरता के दौर में जहां दक्कन में सब एक दूसरे से लड़ रहे थे वहीं दूसरी ओर भारत में 1526 में मुगल सम्राज्य आ चुका था जिसने एक—एक करके सबकों अपनी छतरी के नीचे समेटना शुरू कर दिया था।

इधर दक्कन में अंबर को एक बार फिर से बेचा गया। इस बार उसका नया मालिक था चंगेज खान था जो वहां के राज का प्रधानमंत्री था। दरअसल, चंगेज और अंबर में कुछ बातें कॉमन थी वो ये कि चंगेज और अंबर दोनों ही अफ्रीकी मूल के थे और दोनों को कभी गुलाम बनाया गया था। लेकिन वो आगे चलकर भारत में प्रधानमंत्री के ओहदे तक पहुंचा था। चंगेज से मुलाकात ने अंबर को यह समझने में मदद कर दी कि, भारत में वो अपनी काबिलियत से ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। अंबर चंगेज की सेना में शामिल हो गया और जल्द ही अपनी काबिलियत को प्रूफ कर वो चंगेज का खास बन गया। चंगेज ने उसे लीडरशिप का गुर सिखाया। लेकिन इसी बीच कुछ ऐसा हुआ जिससे चंगेज की मौत हो गई। राज दरबार के कुछ लोग जो चंगेज से जलते थे उन्होंने एक चाल चली और चंगेज को मरवा दिया। लेकिन यहां से अंबर की जिंदगी बदल गई, वो आजाद हो गया। 12 साल की उम्र से गुलाम बने मलिक को अब आजादी मिल गई और उसने बीजापुर की ओर रुख कर लिया।

पहली बार मुगलों से भीड़े Malik Ambar

बीजापुर की लोकल आर्मी में मलिक भर्ती हो गया। यहीं पर उसकी मुलाकात एक ‘हब्शी’ महिला केरिमा से हुई और दोनों ने शादी कर ली। उस समय बीजापुर के राजा की मौत होने के कारण अब शासन उनकी पत्नी ‘चांद बीबी’ के हाथ में था। इस दौरान अंबर ने अपनी काबिलियत के दम पर सेना के अंदर अपनी एक शानदार ओर जांबाजों की टुकड़ी तैयार कर ली थी। जो चांद बीबी के प्रति वफादार थे। अंबर की बहादुरी से खुश होकर चांद बीबी के बेटे ने अंबर को ‘मलिक’ का खिताब दिया था। तभी से अंबर ‘मलिक अंबर हो गए। इसी समय बीजापुर और अहमदनगर के बीच लड़ाई हुई और वहां का शासक मारा गया। ऐसे में अहमदनगर भी चांद बीबी के शासन में आ गया। लेकिन वहां का प्रधानमंत्री मुगलों से जा मिला और अकबर से चांद बीबी पर हमला करने को कहा। मुगल, जो दक्कन में अपना राज जमाना चाहते थे उनके पास अच्छा मौका था। ऐसे में 1595 में अकबर की सेना उसके बेटे मिर्जा के नेतृत्व में दक्कन की ओर बढ़ी।

चांद बीबी की सेना और मुगलों के बीच लड़ाई हुई। एक ओर चांद बीबी की सेना ने मुगलों की सेना पर कहर बरपाया तो वहीं दूसरी ओर मलिक और उनकी सेना ने मुगलों की सप्लाई लाइन काट दी। इस लड़ाई में मुगल चांद बीबी के हाथों हार गए और वापस लौट गए। कुछ सालों तक शांति बनी रही लेकिन 1599 में बीबी की मौत के बाद मुगलों ने बीजापुर पर कब्जा कर लिया। लेकिन बीबी के प्रति वफादार मलिक के लिए यह एक मौके के रूप में आया। देशभक्ति और मुगलों से आजादी के नाम पर उन्होंने धीर—धीरे एक बड़ी सेना खड़ी कर ली। जिसमें मुगल सैनिक, मराठी हिन्दू, तुर्क आदि थे। मलिक ने छत्रपति शिवाजी से पहले के शासक थे। जिन्होंने छापामार युद्ध यानि गुरिल्ला युद्ध शुरू किया। अंबर में मुगलों की सबसे बड़ी ताकत उनकी संख्या को उनकी कमजोरी बना दी। ऐसे में मुगलों को लौटना पड़ा।

हब्शी,Malik Ambar

एक गुलाम से किंग मेकर और फिर किंग बने अंबर 

अब जब अहमदनगर मलिक अंबर के कंट्रोल में था तो उसे पता था कि, कोई भी ज्यादा दिनों तक एक हब्शी को राजा के रूप में नहीं देख सकता। ऐसे में मलिक ने बीजापुर के शाही परिवार के एक सदस्य सुल्तान मुर्तजा को एक पपेट राजा बना दिया और उससे अपनी बेटी की शादी करा दी। ऐसे में मलिक का डायरेक्ट कंट्रोल राजगद्दी पर हो गया। अफ्रीका का एक गुलाम अब भारत में किंग मेकर था, असल में अब एक सल्तनत का राजा था। इतिहास लिखा जा चुका था, लेकिन अभी और लिखा जाना था। अंबर ने 1610 तक मुगलों से एक शांति स्थापित की और अपने विद्रोहियों को भी पस्त किया। लेकिन इसी बीच अकबर की मौत के बाद जहांगीर गद्दी पर बैठा जो दक्कन में अपने राज को फैलाना चाहता था। जहांगीर के इस सपने के आगे अंबर एक चट्टान की तरह खड़ा था। कहते हैं कि, जहांगीर उससे इतना किलस गया था कि, उसने अपने पास एक पेंटिंग बनवा के रखी थी जिसमें वो मलिक अंबर को मारता हुआ दिख रहा है। लेकिन यह तस्वीर एक कोरी कल्पना ही रह गई।

वहीं इसी बीच अपनी दूसरी बीबी के बहकावे में आकर मुर्तजा ने बगावत कर दी। ऐसे में मलिक ने दोनों को मरवा दिया और नाबालिग राजकुमार को अपने संग लेकर अपनी सत्ता कायम की। अंबर अब राजा थे जल्द ही मलिक ने अपनी राजधानी अहमदनगर से बदलकर मुगलों की सीमा के नजदीक औरंगाबाद में कर ली। इस शहर को बसाया और इसे नया नाम दिया। औरंगाबाद बहुत जल्द ट्रेड और कॉमर्स का हब बन गया। उसने साफ पानी के लिए शहर में कैनाल सिस्टम इंट्रोडयूस किया। जिससे उसके खुद के राज और अगल बगल के राज्यों को भी साफ पानी मिला। यह इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना था। वहीं उन्होंने अपने राज्य की हर सीमा पर किले बनवाए जिससे वो राज्य की सुरक्षा के प्रति सुनिश्चित हो सके। 

पहली हार और फिर 1626 में मौत

मलिक अंबर को अपनी पहली हार का सामना 1616 में करना पड़ा। इस लड़ाई से अंबर को समझ आ गया था कि, बीजापुर के शाह आदिल ने मुगलों से दोस्ती कर ली है। मलिक को समझ आ गया कि, उसे बहुत शांति से काम लेना होगा। उसने बीजापुर में कुछ बागियों को खड़ा कर दिया। ऐसे में मुगल और बीजापुर की एक संयुक्त सेना ने मलिक के खिलाफ लड़ाई की घोषणा कर दी। 10 सितंबर 1624 को भतवाड़ी नाम के गांव के एक किले से मलिक ने मुगलों से भिड़ने का निर्णय लिया। इस बार फिर से अंबर ने अपनी पुरानी तकनिक गुरिल्ला वार को अपनाया। बहुत बारिश हो रही थी मलिक ने झील के पानी को सड़क पर लाकर रास्ते को दलदल बना दिया था। ऐसे में जब बड़ी मुगल सेना वहां पहुंची तो उसमें फंस गई। इसी का फायदा उठाकर मलिक के माराठा लड़ाकों ने मुगलो पर छापामार युद्ध शुरू कर दिया और कई मुगल सैनिकों को अपनी ओर मिला लिया। एक बार फिर से मलिक की पुरानी तरकीब मुगलों पर भारी पड़ी।

इस लड़ाई के बाद फिर से मुगलों से शांति स्थापित हुई और इसके दो साल के बाद ही 80 साल के उम्र में मलिक अंबर की मौत हो गई। लेकिन जब तक मलिक अंबर जिंदा रहे मुगलों को दक्कन में घुसने में कभी कामयाबी नहीं मिली। ‘ग्रेट हब्शी मलिक अंबर के बारे में कहा जाता है कि, उनके राज में हिन्दू और मुस्लमानों के बीच शांति बनी रही। उन्होंने कई आर्क्टिेट के भी कई नयाब नमूने बनवाएं जो आज भी औरंगाबाद में मौजूद हैं। पूरे दक्कन में मलिक अंबर को सबसे महान योद्धाओं की लिस्ट में रखा जाता है। हब्शी जिसे हम आज नीच नज़र से देखते हैं असल में उसने दक्कन को अपना घर माना था और मुगल शासन के खिलाफ दक्कन की रक्षा की थी।

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