इन दो स्कूलों में पढ़ते हैं ‘Ambidextrous’ बच्चे, पूरी दुनिया में केवल 1 प्रसेंट है ऐसे लोग

महान चित्रकार लियोनार्दो द विंची के बारे में आपने सुना होगा, बहुत बड़े चित्रकार थे। उनके बारे में कहा जाता था कि, वे एक हाथ से चित्र बनाते हुए अपने दूसरे हाथ से लिख भी लिया करते थे। इतनी दूर क्यों जाना, अपने देश से ही एग्जांपल उठा लेते हैं। हमारे देश के पहले राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद, उनकी काबिलियत के बारे में हमने बहुत कुछ सुना और पढ़ा होगा। उनके बारे में कहा जाता है कि, वे एक साथ अपने दोनों हाथों का इस्तेमाल कर लिया करते थे। इतना ही नहीं वे दोनों हाथों से एकसाथ अलग—अलग भाषाओं में लिखने में भी परांगत थे।

लेकिन यह इतिहास की बात है और सुनने में यूनिक इसलिए लगता है क्योंकि बहुत कम ही लोग होते हैं जो दोनों हाथों से एक साथ लिख पाते हैं। वैसे राइट हैंड से लिखने वालों को लेफ्ट हैंड से लिखने वाले भी अजूबे ही लगते हैं। मतलब यार लिख कैसे लेते हैं। लेकिन लेफ्ट हैंड वालों के लिए सब नॉर्मल होता है। लेकिन दोनों हाथ से एक साथ लिखने की बात और उसमें भी अलग—अलग भाषाओं में, ये तो सबके लिए यूनिक बात है और देखने वालों को अचंभित कर देता है। लेकिन मध्यप्रदेश और कर्नाटका में स्थित दो ऐसे स्कूल हैं जहां के बच्चों के लिए यह कोई यूनिक बात नहीं है, इनके लिए यह नार्मल है और रोज का काम भी।

Ambidextrous

मध्यप्रदेश का वीणा वादनी स्कूल और यहां के Ambidextrous बच्चे

सबसे पहले बात मध्यप्रदेश की कर लेते हैं। यहां की राजधानी भोपाल से 688 किमी. की दूरी पर सिंगरौली नाम की जगह है। यहां पर एक स्कूल है जहां एक दो नहीं बल्कि 300 से भी ज्यादा ऐसे स्टूडेंट्स हैं जो दोनों हाथों से लिखते हैं। सिंगरौली के इस स्कूल का नाम है ‘वीणा वादनी स्कूल’। सच में इस स्कूल में माता वीणा वादनी की बड़ी कृपा है, तभी तो यहां के बच्चे एक साथ अपने दोनों हाथों को नॉर्मल तरीके से यूज कर पाते हैं। सिर्फ इतने से ही मत चौकिए। यहां के बच्चे दोनों हाथों से सिर्फ एक ही लैग्वेज में नहीं लिखते बल्कि वे अपने दोनों हाथों से हिन्दी, ऊर्दू, संस्कृत, रोमन, अरबी और अंग्रेजी जैसी 6 भाषाओं में हाई स्पीड में लिख सकते हैं। क्यों चौक गए ना!

अंग्रेजी में ऐसे बच्चों को ‘एम्बीडेक्सट्रस’ कहते हैं और पूरी दुनिया में केवल 1 प्रसेंट ही बच्चे ऐसे हैं जो इस कैटेगरी में आते हैं। लेकिन यहां सवाल उठता है कि, यह बच्चे ऐसा कर कैसे पाते हैं और इस स्कूल में ऐसा क्या होता है कि, बच्चे दोनों हाथों से लिखना सीख जाते हैं? इस सवाल का जवाब हैं इस स्कूल के प्रिंसिपल बी.पी शर्मा के पास।  

बी.पी शर्मा इस स्कूल के प्रिंसिपल होने के साथ ही इसके फाउंडर भी हैं। वे देश के पहले प्रेसिडेंट राजेंन्द्र प्रसाद की दोनों हाथों से लिखने के टैलेंट से काफी प्रभावित थे। ऐसे में जब आर्मी से शर्मा जी रिटायर्ड हुए तो उन्होंने यह स्कूल खोला और यहां आने—वाले हर बच्चे को दोनों हाथों से लिखने की ट्रेनिंग देने लगे। वे कहते हैं ‘जो भी नया बच्चा आता है उसे पहले राइट हैंड से लिखवाते है, फिर लेफ्ट हैंड से लिखवाते हैं और उसके बाद दोनों हाथों से लिखवाने की प्रैक्टिस करवाई जाती है। लेकिन बच्चों को जो यहां सिखाया जाता है वो इनकी अपनी क्वालिटी बन जाती है। ड्यू टू योगा, जो इन्हें हर रोज स्कूल में कराया जाता है। वहीं स्कूल में साइंटिफिक एप्रोच के साथ खेल—खेल में बच्चों की पढ़ाई करा दी जाती है। ऐसे मे ये बच्चे जो भी सीखते हैं वो इनके अंदर इन्हेरेंट क्वालिटीज बन जाती है।

Ambidextrous

कर्नाटका के कलबुर्गी के Ambidextrous बच्चे

एमपी के सिंगरौली की तरह ही कर्नाटका के एक स्कूल के बच्चे भी दोनों हाथों से एक साथ लिखने में उस्ताद हैं। कर्नाटक के कलबुर्गी में ‘श्रीराम कन्नड कॉन्वेट स्कूल’ के बच्चे भी एक साथ दोनों हाथों से फटाफट लिखते हैं। इस स्कूल के सभी बच्चे दोनों हाथों से लिख सकते हैं। स्कूल के बच्चों में क्रिएटिव थिंकिंग को डेवलप करने और कॉम्पलिकेटेड सवालों को सोल्व करने की क्षमता को डेवलप करने के लिए स्कूल में बच्चों को एम्बीडेक्सट्रेसी में परांगत कराया जाता है।

इन स्कूली बच्चों की इस अनोखी प्रतिभा को लेकर डॉक्टर कहते हैं कि, हमारे ब्रेन सेल्स रिपिटेटिव एक्टिविटी को लेकर रिसपॉन्स करते है और ये हमेशा पहले की तुलना में बड़े आकार और नंबर में होता है और कनेक्शन भी पहले से ज्यादा मजबूत होता है। वे मानते हैं कि, ऐसे केस में जहां बच्चे दोनों हाथों से दो भाषाओं में लिख सकते है, इसमें दो उनके ब्रेन के दोनों भागों में स्टीमुलेशन की क्रिया बहुत तेजी से होती होगी।

डॉक्टरों की बात तो बिल्कुल सही है। ये बच्चे सिर्फ लिखने में ही मास्टर नहीं हैं बल्कि चीजों को याद रखने की क्षमता भी इनकी बहुत ज्यादा है। वीणा वादनी स्कूल के बच्चों को तो 80 तक के पहाड़ें मुहं जुबानी याद हैं! इन स्कूलों के टीचर तो यही मानते हैं कि, फ्यूचर तो इन्हीं बच्चों का है। 

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