इंजीनियरिंग छोड़ शुरू किया मखाना बेस्ड स्टार्टअप, अब दुनिया में हो रहा है बिहार का नाम

मखाना…. बिहार के मिथिलांचल की अनेक पहचानों में से यह भी एक है। झील या नदी के पास मौजूद वेटलैंड्स में आमतौर पर इसकी खेती होती है। बिहार में आज कल मखाना को लेकर एक अलग क्रांति सी आईं हुई है, कई किसानों ने पारंपरिक खेती को छोड़ कर अब मखाना पर अपना ध्यान केंद्रित किया है, इसका सबसे बड़ा कारण है देश और दुनिया में बढ़ती इसकी मांग। बिहार में इसे लावा भी कहते हैं। आज के दौर में मखाना उत्पादन और इसके प्रोसेसिंग में एक बड़ा अवसर लोगों को दिख रहा है। यही कारण है कि कई लोग अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ कर इस ओर मुड रहे हैं। ऐसे हीं लोगों ने एक नाम पूर्णिया के रहने वाले अमन वर्णवाल है, जिन्होंने हाल में अपनी अच्छी खासी इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ कर मखाना को लेकर एक स्टार्टअप शुरू किया, और आज ये स्टार्टअप अमेरिका, जर्मनी और सिंगापुर जैसी जगहों पर अपने मखाना प्रोडक्ट्स बेचने को तैयार है।

‘वाल्श स्नैक्स’ को 2018 में शुरू किया अमन ने

वाल्श स्नैक्स, मखाना

अमन ने 2018 में अपनी इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ कर वाल्श स्नैक्स नाम का स्टार्टअप शुरू किया है। इस स्टार्टअप की खासियत ये है कि ये मखाना को कॉर्न फ्लैक्स की तरह रेडी टू यूज के रूप में मार्केट में उतारती है। ये स्टार्टअप भारत के महत्तवपूर्ण 500 स्टार्टअप्स में से एक है। आज अमन के इस स्टार्टअप्स के मखाना प्लान यानि की स्नैक्स प्रपोजल को दुनिया के तीन बड़े देश अमेरिका, जर्मनी और सिंगापुर में सेलेक्ट किया गया है। यानि जल्द ही इस स्टार्टअप के जरिए बनने वाले फुली प्रोसेस्ड मखाना स्नैक्स इन देशों में अपना स्वाद बिखेरेंगे।

अमन मानते हैं कि, बिहार में अभी भी पारंपरिक खेती पर ज्यादा जोर दिया जाता है, लेकिन मखाना कि खेती और व्यापार दोनों में ही लोगों के लिए रोजगार के कई बेहतरीन अवसर मौजूद हैं। अमन अपने स्टार्टअप के जरिए सिर्फ मखाना ही नहीं, बल्कि किसानों द्वारा उगाए जाने वाले अन्य उत्पादों को भी प्रोसेस्ड स्नैक्स के रूप में नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर उतारने की पहल कर रहे हैं। वाल्श स्नैक्स’ स्टार्टअप फिलहाल, पटना, बेंगलुरु, सिंगापुर, जर्मनी और अमेरिका में मखाना प्रोडक्ट की सप्लाई कर रही है।

आज अमन का ये मखाना स्नैक्स स्टार्टअप कामयाबी की राहों पर है, ऐसे में उन्हें अपने परिवार की ओर से भी पूरी मदद मिल रही है। अमन की माने तो जब उन्होंने नौकरी छोड़ कर स्टार्टअप करने कि बात कही थी तो घर में थोड़ा असमंजस की स्थिति थी, लेकिन अब उनके पिता विजय वर्णवाल उनके काम से बहुत संतुष्ट हैं। उनके पिता कहते हैं की बेटे की मेहनत रंग लाई है। वहीं उनके साथ जुड़े कई मखाना किसान ये मानते हैं कि अब जब अमन का स्टार्टअप दुनिया में मखाना को पहुंचा रहा है, ऐसे में बिहार का नाम तो हुआ हीं है साथ ही स्थानीय किसानों और लोगों के लिए रोजगार का अवसर भी बढ़ा है।

वहीं वर्णवाल कहते हैं कि, उनका अब लक्ष्य है की मखाना को किसी न किसी रूप में हर घर तक पहुंचाया जाए। इसी यकीन के साथ वे अपने स्टार्टअप को विश्वस्तरीय आयाम देने में लगे हैं।

मखाना क्या है और कैसे उगाया जाता है

वाल्श स्नैक्स, मखाना

मखाना एक नकदी फसल है, जो देखने में सफेद और सवार में एक अलग अनोखापन लिए होता है। ये आमतौरपर झील या वेटलैंड्स में उगाया जाता है। इसको उगने में किसानों को काफी मेहनत करनी पड़ती है।

मखाना के बीज दिसंबर से जनवरी के बीच में बोए जाते हैं. अप्रैल में इसके फूल आने लगते हैं जो जुलाई तक पानी की सतह पर दिखने लगते हैं। मखाने का फल काफी कांटेदार होते हैं। इसलिए बाद में यह पानी के नीचे जाकर बैठ जाते हैं, जब 1 से 2 महीनों में ये कांटे गल जाए है तक सितंबर से अक्टूबर में इसके फूलों को इकट्ठा कर इसके बीजों को तेज धूप में सुखाया जाता है।

बिहार के सीमांचल में भारत का 80 प्रतिशत मखाना उगाया जाता है। बिहार में सबसे पहले मधुबनी में मखाना की खेती की शुरुआत हुई थी। वर्ष 1954 के बिहार गजेटियर में इसका जिक्र है। मखाना मधुबनी से ही निकलकर देश के अन्य स्थानों पर फैला है। इसका इस्तेमाल लोग खीर बनाने में आम तौर पर करते हैं। वहीं इसका इस्तेमाल अन्य कई रूप में भी होता है। मणिपुर में इसके जड़कंद और डंठल की सब्जी भी बनती है।

ये फसल पानी में उगती है इसलिए इसमें कोई फर्टिलाइजर वगैरा यूज नहीं होता, यानि ये 100 परसेंट ऑर्गेनिक होता है। मखाना कई पोषक तत्वों से भरपूर होता है, ऐसे में ये डायबिटीज जैसे रोगोगियों के लिए फायदेमंद है। वहीं ये त्वचा को जवान बनाए रखता है। इसके आलावा पाचन, किडनी को मजबूत करने, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने और दिमागी तनाव को दूर करने में मदद करता है।

किसानों के लिए फायदे का सौदा

वाल्श स्नैक्स, मखाना

मखाना जिसे लोटस सीड, फोक्स नट, प्रिकली लिली आदि के नाम से जाना जाता है, इसकी खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा है। 1 एकड़ में आराम से 10 से 12 क्विंटल मखाना उगाया जा सकता है। जो बाजार में 10,000 रुपए क्विंटल के भाव से बिक जाता है। किसान 20 से 25 हजार की लागत में प्रति एकड़ के हिसाब से 1 से दो लाख कमा लेते हैं।

बिहार के सीमांचल के लिए मखाना परंपरा का हिस्सा है, ऐसे में यहां के लोग इसे पारंपरिक काम मान कर भी इसे करते हैं अमन आज इसी परंपरा को एक नए मुकाम तक पहुंचा रहे हैं। कुल मिलाकर कहें तो अमन का इंजीनियरिंग छोड़ने का फैसला आज मखाना और उनके लिए नए आयाम खोल चुका है।

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