आधुनिक युग के सबसे बड़े साधक थे परमहंस, हर धर्म को अपनाया और सत्य को जाना

‘स्वामी विवेकानंद’ को कौन नहीं जानता। हमारे देश में ‘युवा दिवस’ यानि की यूथ डे उन्हीं की जयंती पर मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद को ज्ञान, दर्शन और सनातन धर्म के सबसे बड़े संतों में से एक माना जाता है। उन्होंने 1893 में विश्वधर्म सम्मेलन में ‘सनातन धर्म’ के बारे में दुनिया को बताया और इसकी महानता से दुनिया को परिचित कराया। लेकिन ‘इतनी कम उम्र में ‘स्वामी विवेकानंद’ को इतना कुछ कैसे ज्ञात हुआ? जब भी यह सवाल उठता है तो बात एक और महान संत की सामने आती है जिनका नाम था ‘रामकृष्ण परमहंस’। ऐसा कहा जाता है कि खुद ‘रामकृष्ण परमहंस’ ने नरेन्द्र यानि की विवेकानंद को चुना था, ताकि उनके मरने के बाद उनके ज्ञान, अध्यात्म और आत्म अनुभव को दुनिया भर में वो बता सकें। ‘रामकृष्ण परमहंस’ का जन्म 18 फरवरी 1836 में हुआ था। उनके बारे में बहुत कुछ कहा जाता है जैसे कि, वो मां काली के परम भक्त थे, इतने परम भक्त थे कि, खुद मां काली उनके सामने प्रकट होकर उनके हाथों से खाना खाती थी। वहीं कुछ लोग उन्हें अवतार मानते थे। लेकिन इस सब के अलावा वो पूरी दुनिया के पहले ऐसे संत रहे जिसने लगभग पूरी दुनिया में जितने भी धर्म हैं उसका पालन कर सत्य को खोजने में अपने जीवन को लगा दिया। जब वे इस्लाम का पालन करते तो काली को भी पूरे तरीके से भूल जाते और एक पक्के मुस्लमान वाले फेज में चले जाते। इसी तरह बाकी धर्मो के समय होता। असल में रामकृष्ण परमहंस को किसी एकधर्म से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। 

रामकृष्ण परमहंस

भारत के आध्यात्मिक परंपरा की एक खासियत रही है और वो है यहां की गरु शिष्य परंपरा और इसी कारण यहां का ज्ञान जीवित रहा और एक जेनरेशन से दूसरे तक पहुंचता रहा। विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का संबंध मॉर्डन एज में इसी रिश्ते का जीवित प्रमाण रहा है। लेकिन गुरुओं की एक खास महानता रही है और वो ये कि, वे अक्सर गुमनामी की ज़िंदगी बिताते हैं और ज्यादात्तर समय साधना और मानव सेवा में लगाते हैं। रामकृष्ण का जीवन भी इसी तरह का था। एकदम सरल और सरल व्यक्तित्व वाले परमहंस की जिंदगी को अगर हिन्दी के कुछ शब्दों में समेटना हो तो पांच शब्द हमारे पास होंगे — त्याग, सेवा, साधना, प्रयोग और समन्वय। सरल स्वभाव के कारण ही उनका व्यक्तित्व बहुत ही रहस्यमयी था और लोग उन्हें समझ नहीं पाते थे। इसलिए कई लोग उन्हें पागल तक कह देते थे और कई बार तो लोगों ने उनका ईलाज कराने तक की कोशिश की। अपने युवा अवस्था से ही अधायत्म में अग्रसर हो चुके रामकृष्ण को लेकर एक कहानी है कि, इसी वक्त एक बार कुछ लोग उन्हें एक डॉक्टर के पास लेकर गए और उनके दिमाग का ईलाज करने की बात कही

लेकिन जब डॉक्टर ने ईलाज करना शुरू किया तो जल्द ही हाथ खड़े कर लिए। ढाका के उस एक मानसिक चिकित्सक ने उस वक्त उनके बारे में कहा था कि, यह आदमी एक महान योगी और तपस्वी है, जिसे दुनिया अभी समझ नहीं पा रही है। डॉक्टर ने आगे यह भी कहा कि, इनका किसी भी तरह का इलाज मेडिकल साइंस के जरिए नहीं किया जा सकता। जिस तरह कबीर, रैदास, मीरा को समझना मुश्किल था ठीक उसी तरह रामकृष्ण को समझना मुश्किल था। लेकिन लोग प्रयास करते रहते और जो भी उनके पास उनको ठीक करने की मंशा से पहुंचता वो बस रामकृष्ण का ही हो जाता।

जब रामकृष्ण परमहंस ने किए मां काली के दर्शन

रामकृष्ण परमहंस जब छोटे थे तब ही उनके पिता की मौत हो गई। जिसके बाद उनके बड़े भाई रामकुमार के ऊपर सारी जिम्मेदारी आ गई। उन्हें दक्षिणेश्वर मंदिर में पुजारी का काम मिल गया। रामकृष्ण भी उनके सहरायक के रुप में वहां लग गए। इस दौरान उनका काम मां काली की प्रतिमा को सजाने का हुआ करता था। इसी समय उनकी भक्ति मां काली के प्रति बढ़ गई, वे काली को खुद की और पूरे ब्रह्माण की माता के रूप में देखने लगे। बड़े भाई की मौत के बाद रामकृष्ण पुजारी हो गए और इस दौरान काली के प्रति उनकी भक्ति एक अलग स्तर पर चली गई। वे किसी तरह से भी काली का दर्शन करना चाहते थे। कई दिनों की साधना के बाद जब काली के दर्शन नहीं हुए तो रामकृष्ण ने अपनी जान देने का निर्णय कर लिया। वे मंदिर की दिवार पर लटकी एक तलवार की ओर बढ़ ही रहे थे तभी अचानक देवी के रूप में काली के दर्शन हुए। वे बेहोश होने वाले थे तभी उन्होंने कुछ और भी देखा। परमहंस ने इस दौरान देखा कि, घर, दरवाजे, मंदिर और बाकी सब पूरी तरह से गायब हो गए, जैसे कि, कहीं भी कुछ भी नहीं था! और उनके सामने प्रकाश का एक असीम समुद्र था। इसके बारे में उन्होंने कहा है कि, वह समुद्र चेतना थी। मैने दूर तक और जिस भी दिशा में देखा, मुझे चमकती लहरें दिखाई दीं, एक के बाद एक, मेरी तरफ आ रही थीं।’

रामकृष्ण परमहंस ने हर धर्म को अपनाया और जिया

रामकृष्ण परमहंस के बारे में कहा जाता है कि, वे आधुनिक युग के योगी थे। जब बात योगी की आती है तो वो धर्म से परे होता है। रामकृष्ण परमहंस भी धर्म के बंधन से परे थे। उनकी जिंदगी धार्मिक लोगों के बीच पली—बड़ी लेकिन उन्होंने इस दौरान लोगों को पंथ और धर्म के नाम पर लड़ते हुए देखा। ऐसे में उनका मानना था कि, अगर कोई भगवान सच में होता है तो उसे इंसान के प्रयोग पर भी खरा उतरना होगा। वे ईश्वर को हर तरह से देखना चाहते थे। पहले तो यह केवल एक जिद्द थी लेकिन बाद में यह भक्ति में बदल गई। प्रयोग करके देखने की और जानने की उनकी इसी रुचि ने उन्हें हर धर्म को जीने का मौका दिया। वे अपनी आध्यात्मिक खोजयात्रा में जब जिसके करीब आए पूरी श्रद्धा और समर्पण भाव से उसी के हो लिए।

इस्लाम अपनाया :—  अपनी अध्यात्मिक खोज के दौरान ‘गोविंद राय’ नाम के एक सूफी साधक ने उन्हें इस्लाम की ओर प्रेरित किया। वो इस दौरान मुसलमान साधुओं के संपर्क में भी आए। इस दौरान अल्लाह का नाम उन्हें इस हद तक चढ़ गया वे राम काली सब को भूल गए। बोल-चाल, वेश-भूषा और रहन-सहन सब मुसलमानों की तरह हो गया, वे पांचों वक़्त की नमाज पढ़ते और बाकी समय अल्लाह की रट लगाए रहते। तीन दिन तक ऐसा ही रहा और तीसरे दिन उन्हें ऐसा लगा कि खुद मोहम्मद उनके अंदर समा गए।

ईसाईयत को अपनाया :— इसी तरह मणि मल्लिक नाम के अपने एक भक्त के घर बाइबिल का पाठ सुनकर रामकृष्ण को ईसा मसीह में इंट्रेस्ट आ गया। वे ईशु के त्याग और प्रेम के संदेश से इतने प्रभावित हुए कि, उनका रवैया बिल्कुल ईसा मसीह की तरह हो गया। ईसा के संदेशों को उन्होंने अपने जीवन में इस हद तक आत्मसात कर लिया था कि, रोम्या रोलां ने उन्हें ‘ईसा मसीह के छोटे भाई’ की संज्ञा दी थी।

इस बारे में परमहंस ने कहा था :— सभी धर्मों- हिंदू, इस्लाम, ईसाई का अभ्यास मैने किया है और मैंने विभिन्न हिंदू संप्रदायों के मार्ग का अनुसरण भी किया है। मैंने पाया है कि, यह वही ईश्वर है जिसकी ओर सभी अपने कदम बढ़ा रहे हैं, हालांकि अलग-अलग रास्ते पर चलते हुए। आपको सभी मान्यताओं की कोशिश करनी चाहिए और सभी अलग-अलग तरीकों से एक बार पार करना चाहिए। मैं जहां भी देखता हूं, मुझे धर्म के नाम पर झगड़ते हिंदू, मोहम्मद, ब्रह्मोस, वैष्णव और बाकी दिखते हैं। लेकिन वे कभी यह नहीं देखने की कोशिश करते कि, जिसे कृष्ण कहा जाता है, उसे शिव भी कहा जाता है, और यीशु या अल्लाह भी या कई और हजार नामों से पुकारा जाता है।

अद्वैत और रामककृष्ण :— रामकृष्ण जब तक काली की भक्ति में दिखाई देते हैं तब तक वो काली को मां और खुद को बेटे के रुप में पाते हैं। लेकिन अद्वैत और वेदांत दर्शन से जब वे जुड़े तो उन्हे ज्ञात हुआ कि, जीव ही शिव है। इस दौरान परमहंस ने तब कहा कि, जत्र जिव तत्र शिव। उन्होंने कहा ‘जीवे दया नोय, शिव ज्ञाने जीवे सेवा” अर्थात किसी जीव पर दया मत दिखाओं, बल्कि खुद शिव की तरह उनकी सेवा करो।  उनके इसी दर्शन पर आगे चलकर विवेकानंद ने मानव सेवा का प्रण लिया और कई सूखी ग्रस्त जगहों पर काम किए और अनाथालय खोले। अद्वैत के उनके सफर में गुरु तोतापुरी का बड़ा अहम रोल रहा है। वे महानिर्वाणी अखाड़ा के नागा संत थे जिन्होंने परमहंस को सन्यास की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित किया।

रामकृष्ण परमहंस

इस सब के अलावा रामकृष्ण की जिंदगी से हम और भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। इसमें सबसे बड़ी चीज है जेंडर इक्वेलिटी। रामकृष्ण परमहंस के अनुसार, आत्मा पुरूष या महिला नहीं होती। वो जिस शरीर में होती है उस अनुसार ही काम करती है। परमहंस भक्ति के उस चरम स्तर पर होते थे कि, वे पुरूष रुप में होते हुए भी एकदम महिला रुप में होकर मां काली की पूजा करते थे। वहीं उनके जीवन में उनकी पत्नी का भी एक अहम रोल रहा है। उनकी पत्नी सारदा देवी उनसे उम्र में भले ही छोटी थीं लेकिन उनकी हर साधना में उनकी बराबर की हिस्सेदारी थी। परमहंस सारदा देवी को व्यक्तिगत रूप से दिव्य माता के रूप में मानते थे और उनकी पूजा करते थे।

अंत में हम उनके द्वारा सुनाई जानेवाली एक कहानी आपको बताते हैं जिससे आप राम कृष्ण के संदेशों को समझ सकेंगे।

‘एक बार एक नदी में एक नाव पर कुछ लोगों के संग एक महान पंडित जी सवार थे। पड़ित जी अपने पांडत्व का बखान कर रहे थे। वे बाकी लोगों से पूछते हैं कि, क्या आप लोगों ने वेद पढ़ा है? जवाब आता है नहीं, फिर पूछते हैं वेदांत पढ़ा है? फिर जवाब आता है नहीं। बात चलती रहती है कि कभी नदी में भयंकर तूफान आता है नाव डूबने को होता है। इतने में नाव पर सवार एक व्यक्ति पंडित जी से पूछता है कि, क्या आपको तैरना आता है? पंडित जी जवाब देते हैं नहीं। इसपर वो व्यक्ति कहता है कि, पंडित जी भले मुझे वेद वेदांत का ज्ञान न हो लेकिन मुझे तैरना आता है।’

इस कहानी से साफ है कि, परमहंस की शिक्षा जरूरी और व्यवहारिक ज्ञान की थी। जिसका सीधा शब्दों में अर्थ खुद के प्रयोगों से सीखने का है। असल में सनातन और भारतीय संस्कृति भी यही है। आंख मूंदकर विश्वास करने की हमारे यहां परंपरा नहीं रही है। हमारी भारतीय भूमि साधकों की भूमि रही है विश्वास में पड़े रहने वालों की नहीं और परमहंस आधुनिक युग के सबसे बड़े साधक थे शायद इसी कारण दुनिया ने उन्हें अवतार माना। 

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