आजाद भारत में कितना आजाद हैं महिलाओं का पहनावा

हमारे देश में महिलाएं आजाद है… वो सब करने के लिए जो वो करना चाहती है। अपने मनचाहे कपड़े पहनने के लिए, पसंद का खाना खाने के लिए, घूमने के लिए, और यहां तक की अपना मनचाहे लड़के से शादी करने के लिए भी।

लेकिन.. इन आजाद महिलाओं और लड़कियों में केवल उन्हीं की गिनती की जाती है.. जो पढ़े-लिखे, और अच्छी-खासी अर्बन क्लास सोसाइटी से बिलॉन्ग करती हैं। मगर हकीकत असल में यही है। कई बड़े-बड़े शहरों में भी आज के वक्त में महिलाओं को उनके तरीके से जीने का अधिकार नहीं है। आज भी महिलाएं घूंघट की आड़ में जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। जी हां, घूंघट.. राजस्थान, हरियाणा उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार सहित ना जाने कितने ही राज्यों में हिंदू धर्म की महिलाओं को शादी के बाद घूंघट करने की परंपरा का चलन है। तो वहीं बात अगर मुस्लिम वर्ग की करें, तो इस्लाम में लड़कियों से लेकर महिलाओं तक के बुर्का पहनने की प्रथा है।

लेकिन सवाल ये उठता है कि, आखिर भारत में इस पर्दा प्रथा की शुरूआत कैसे हुई, क्योंकि, ईसा से 500 वर्षों पहले तक कहीं भी पर्दा प्रथा का कोई जिक्र तक नहीं है। तो वहीं प्राचीन वेदों और धर्मग्रंथों में भी पर्दा प्रथा का कोई विवरण नहीं दिया गया है। यहां तक की रामायण और महाभारत में भी स्त्रियों के पर्दा करने को लेकर कोई बात नहीं कही गई है। इसके अलावा अजंता और खजुराहों की कलाकृतियों में भी महिलाओं को बिना घूंघट के दिखाया गया है। हालांकि, जातक कथाओं की रचनाओं में कहीं-कहीं औरतों के पर्दे में रहने का उल्लेख मिलता है।

Purdah System

Purdah System- जिसे अपने साथ भारत लेकर आए मुगल

कई बुद्धिजीवियों की मानें तो पर्दा प्रथा का चलन भारत में मुगलों के आने के बाद शुरू हुआ। दरअसल, पर्दा.. एक इस्लाम शब्द है जो कि, अरबी और फारसी भाषा से आया है। इसका सीधा सा मतलब होता है ढ़कना या अलग करना। ऐसा माना जाता है कि, मुगलों के भारत आने से पहले  केवल कुछ राजघरानों में ही घूंघट प्रथा के बारे में पढ़ने को मिलता है। और जैसे-जैसे मुगल शासक ने भारत में अपने कदम जमाए वैसे-वैसे पर्दा प्रथा का चलन भी हिंदुस्तान में काफी तेजी से बढ़ता चला गया। वैसे भारत में इस प्रथा की शुरूआत 12वीं सदी से मानी जाती है। हालांकि, 20वीं सदी से इस प्रथा के विरोध में कई जागरूकता अभियान और प्रदर्शनों के चलते कमी देखी गई है।

खैर ये तो था पर्दा प्रथा के भारत में आने का इतिहास, मगर अब बात आती है इसके चलन के पीछे की वजह की, तो मुगलों के भारत आने के बाद भारत में बलात्कार जैसे मामले भी सामने आने लगे थे। धीरे-धीरे स्त्रियों की आब्रूह को बुरी नजरों से बचाने के लिए बुर्का और घूंघट का चलन जोरो से बढ़ने लगा। इसके बाद बस जैसे-जैसे वक्त बीतता गया वैसे-वैसे लोगों ने इसे परंपरा मानकर अपनाना शुरू कर दिया।

शुरूआती दौर में तो खुद महिलाओं ने भी इस प्रथा का काफी समर्थन किया और परंपरा के नाम पर सिर पर पल्ला या घूंघट करना या फिर बुर्के से हर वक्त खुदको ढ़ककर रखने का चलन जारी रखा.. हालांकि, सिर्फ सिर पर पल्ला करना या घूंघट करना कोई बड़ी बात नहीं है। मगर इन परंपराओं के साथ जुड़ी छोटी सोच से ना सिर्फ औरतों के आत्मविश्वास को ठेस पहुंचती है बल्कि, समाज में एक और गलत सोच को जन्म मिलता है..

Purdah System

Purdah System- औरतों के आत्मविश्वास को दबाती परंपरा

दरअसल, पर्दा प्रथा के पीछे दिए गए कारण के अनुसार, महिलाओं को अपने मुंह को केवल इसलिए ढ़क कर रखना चाहिए ताकि, कोई पुरूष उसका मुंह ना देखे। जैसे समाज में सिर्फ कामुक पुरूष ही भरे हुए हैं और केवल किसी स्त्री का मुंह देखने से ही वो उसपर टूट पड़ेंगे।

तो वहीं हिंदू धर्म में घूंघट प्रथा स्त्री के चरित्र और संस्कारों को दर्शाती है। चाहें बात शहरों की करें  या फिर ग्रामीण भारत की। हिंदू धर्म में औरतों को अपने ससुर, जेठ, नंदोई, या फिर ससुराल में हर उस पुरूष के सामने घूंघट में रहना पड़ता है जो उम्र में उससे या उसके पति से थोड़ा भी बड़ा क्यों ना हो। तो वहीं उत्तर प्रदेश में तो कई जगहों पर घर की बहुओं को अपने ससुर के सामने बात करने की भी इजाजत नहीं होती।

शादी के बाद अक्सर कुछ इसी तरह की रूढ़िवादी परंपराओं और सोच के चलते महिलाएं अपनी जिंदगी सिकुड़कर जीने पर मजबूर हो जाती है। मर्यादा और बड़ों का सम्मान करने के नाम पर 24 घंटे घूंघट में रहना, तेज आवाज में बात ना करना, सास-ससुर के सामने जमीन पर बैठना, और बस साड़ी के पल्लू की आड़ में अपनी पूरी जिंदगी यूं ही बिता देना। और तो और जो औरतें इन परंपराओं को नहीं मानती उन्हें समाज के नजरिए से चरित्रहीन और बद्चलन तक मान लिया जाता है। इस प्रथा के चलते भले ही किसी को कोई शारीरिक या मानसिक तौर पर नुकसान नहीं पहुंचता है, मगर महिलाओं के आगे बढ़ने के बीच में ये प्रथा एक रोड़ा बनकर जरूर उभरती है। पर्दे या बुर्के में रहने के कारण उनको समाजिक और बाहरी दुनिया से वंचित रहना पड़ता है। लोगों से कम बातचीत और दायरों में बंधकर उनके आत्मविश्वास को पूरी तरह दबा दिया जाता है। और ऐसी महिलाएं हमेशा किसी ना किसी पर निर्भर रहकर ही अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर होती हैं।

हालांकि, आज के वक्त में कई औरतों ने अपने हक के लिए आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया है। ऐसे में ना सिर्फ पर्दा प्रथा बल्कि हमारे देश में जारी ऐसी ही कई रूढ़िवादी प्रथाओं को पीछे छोड़ महिलाएं ऊंचाईयों को छू रही हैं। जिसके कितने ही उदाहरण आज हमारे सामने मौजूद है। देश की पहली महिला अभिनेत्री दुर्गाबाई कामत से लेकर पहली महिला आईपीएस किरण बेदी तक ना जाने कितनी ही ऐसी औरतें हैं, जिन्होंने समाज की इन रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर अपना नाम देशभर में रौशन किया है।

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