अस्पतालों की मोर्चरी में पूरी होती है लोगों की तलाश

हिंसा और भीड़, हाँ वो ही जिसकी कोई शक्ल नहीं होती है. क्योंकि ये जब भी सड़कों पर निकलती है. तो चारों तरफ का मंजर इतना भयावह हो जाता है कि, इनके गुजरने के बाद बस वहाँ बिखरा पड़ा सामान, पत्थर, जली गाड़ियां, जले घर और यहां तक की खून से लतपत लाशें दिखाई देती है.

इसमें ये सोचने वाली बात है कि, सालों से एक साथ रहने वाले लोग चाहे वो किसी भी समुदाय के क्यों न हो…उनके अंदर भी न जानें क्या पैदा हो जाता है. या तो वो भी उसी हिंसा में शामिल हो जाते हैं. या फिर घरों से बाहर निकलकर एक दूसरे को बचाने में लग जाते हैं….और यही लोग हत्यारी भीड़ के जानें के बाद मिसाल बन जाते हैं.

पूर्वी दिल्ली में तीन दिनों तक चले भयावह मंजर के बाद अब जब लोग अपने से बिछड़े लोगों को तलाश रहे हैं. क्योंकि हिंसा करने आई हत्यारी भीड़ ने क्या हिंदू क्या मुस्लिम सभी को घरों से खींच खींचकर बाहर निकाल कर मार ड़ाला. कुछ लोगों को उन्हीं के परिवार के बाहर तो किसी को कार में भरकर कहीं दूर ले जाकर मार दिया गया.

इन तीनों का मंजर कुछ ऐसा था कि, मानों ये कोई भारत का राजधानी दिल्ली नहीं थी. जहां से महज़ 20-25 किलोमीटर के दायरे में मंत्रियों से लेकर नेताओं के घर हैं. यहां ऐसा लग रहा था. सीरिया और ईराक जैसे लड़ाके हैं. जो अपने से इतर लोगों को खोज-खोज कर बाहर निकाल रहे थे.

अब तक मीडिया रिपोर्ट की मानें तो 38 लोगों की जान जा चुकी है. हालांकि अभी भी कई ऐसे लोग हैं. जो अपनों से बिछड़े हुए हैं.

दंगाईयों की हिंसा ने छीन लिए अपने

मोहम्मद मुशर्रफ की बहन की मानें तो, जब हमने सुना की भीड़ पड़ोस के घरों में घुस कर हमला कर रही है तो, हम सभी कपड़ों की आलमारी में छिप गए. लेकिन इस बीच मेरा भाई उनके हाथ लग गया. जिसे वो खींचकर लेकर चले गए. तब से हम उसको ढूंढ रहे थे….अब जब हम गुरुतेग बहादुर अस्पताल गए तो मुझको मेरा भाई मिला…वो भी मोर्चरी में.

GTB hospital & mortuary

वहीं फरहीन की मानें तो, हिंसा जब शुरू ही हुई थी तभी हम अपना घर छोड़कर वहां से जानें वाले थे. हालांकि हम निकल पाते उससे पहले दंगाई आ गए…हम फर्स्ट फ्लोर पर रहते हैं. मैंने अपने पति को कपड़ों के ढ़ेर में छिपा दिया और अपने भाई को आलमारी में. लेकिन उन्हें आलमारी का मालूम चल गया और वो उसे घसीटते हुए लेकर चले गए. इस दौरान मैं सबसे मदद की गुहार लगाती रही. लेकिन कोई नहीं आया. अब मेरे भाई का शव जीटीबी अस्पाल के मोर्चरी में ही मौजूद है.

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अंकित शर्मा का नाम भला आज कौन नहीं जानता…जिस समय अंकित की माँ चाय बनाने गई रही थी. तभी पड़ोस में हल्ला हो रहा था और अंकित उसको देखने निकला था कि, भीड़ कहीं उसके घर के पास तो नहीं आ गई. लेकिन दंगाईयों ने अंकित को वहां से खींचकर चांदबाग में मार दिया और नाले में डाल दिया.

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वारिस अली खान का भी दर्द इन्हीं से मिलता जुलता है. जिनता भतीजा मोहसीन जब अपना काम खत्म करके वापस आ रहा था कि, भीड़ ने उसे घेर लिया. इस दौरान मोहसीन ने अपने दोस्तों को नंबर डॉयल किया. हालांकि जब तक वो आते तब तक दंगाई उसे वहां से घसीटकर नाले में फेंक चुके थे. मोहसीन का भी शव जीटीबी अस्पताल के मोर्चरी में मौजूद है.

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ब्रह्मपुरी के रहने वाले राजीव सैनी का भी दर्द इन्हीं से मिलता जुलता है. जिनका भाई नरेश इस समय आईसीयू में जिंदगी की जंग लड़ रहा है. 32 साल के नरेश को हिंसा के पहले ही दिन घर के बाहर ही सीने में गोली मार दी गई. तब से अब तक वो आईसीयू में जिंदगी के लिए जंग लड़ रहे हैं. नरेश की पांच साल की बेटी और तीन साल का बेटा अपने पिता के वापस आने का इंतजार कर रहे हैं.

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राम सुबारत पासवान की भी दास्तां इनसे बिल्कुल भी अलग नहीं है. जो पेशे से रिक्शा चलाते हैं. उनका बेटा नितिन कुमार जोकि घर के दरवाजे पर खड़ा था. 15 साल के नितिन कुमार को दंगाईयों ने सिर पर रोड़ मार दी और वहां से लेकर चले गए. तब से लेकर अब तक राम सुबारत अपने बेटी के शव के लिए कभी गोकलपुरी जाते हैं तो कभी वापस अस्तपाल…लेकिन अब तक उन्हें शव नहीं दिया गया.

जीटीबी अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. सुनील कुमार की मानें तो, घयालों का आना अस्पताल में लगातार जारी है. कई घायलों को डिस्चार्ज कर दिया गया है. हालांकि 50 से ज्यादा घायल अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं. उनका इलाज चल रहा है. हमने अभी तक 33 मौतों की पुष्टि कर दी है. जिसमें 22 लोगों की मौत यहां आने से पहले ही हो चुकी थी. जबकि अन्य लोगों की मौत यहां आने के बाद हुई.

जाहिर है…इस दंगे में कितने बिछड़ गए. कितने घर जल गए….कितने अपने-अपनों से दूर चले गए. इसका फर्क उन दंगाइयों और हिंसा फैलाने वालों लोगों को नहीं पड़ता. फर्क बस उनको पड़ता है. जिनकी पूरी उम्र की मेहनत जलकर खाक हो गई. या फिर उनको जिनके अपने-अपनों से दूर हो गए. क्योंकि पूरी उम्र अब इस जख्म को भुलाना मुमकिन नहीं.

इस भीड़ और हिंसा में जिनके अपने बिछड़ गए हैं. वो लोग मॉर्चरी जाकर देख रहे हैं….और शवों को मोर्चरी से ले जानें का सिलसिला चल रहा है.  

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