असल ज़िंदगी के बजरंगी भाईजान, जो 400 लोगों को पहुंच चुके हैं घर

फिल्में…एक ऐसा प्रारूप जहां हम अपने जैसे तमाम किरदारों से लेकर काल्पनिक दुनिया से लेकर हकीकत की दुनिया को रूबरू कराते हैं. हम कल्पना की मोटी चादर से लेकर हकीकत के किरदारों को पर्दों पर उतारकर एक अनोखी दुनिया, अनोखा परिवेश बना देते हैं. जहां हम अपने अंदर पलते ख्यालों को हकीकत में उतरते देखते हैं. हालांकि दुनिया की कोई भी कहानी क्यों न हो, या वो कहानी कल्पना की चादर में कितनी ही क्यों न लिपटी हो…असल में उसके तार हमेशा से कहीं न कहीं हकीकत से जुड़े रहते हैं. आज से कुछ समय पहले हमारे देश में एक फिल्म आई थी, ‘बजरंगी भाईजान’. जिसमें सलमान खान अपने परिवार से बिछड़ी मुन्नी को सरहद पार कर पाकिस्तान छोड़ने जाते हैं. हालांकि ये एक फिल्म थी. जहां कल्पना से लेकर हकीकत की चादर में सबकुछ समेटा गया था. हम आपको मिलाने आए हैं बजरंगी भाईजान की तरह ही, एक रियल लाइफ करैक्टर शैलेश कुमार से.

उत्तर प्रदेश के बरेली में रहने वाले शैलेश कुमार का इकलौता काम बेसहारा और मनोरोगियों को उनके अपनों से मिलाने का है और यही लगन है की अब तक शैलेश कुमार लगभग 400 बेसहारा लोगों को पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, पंजाब, बिहार और महाराष्ट्र में उनके घरों तक पहुंचा कर उन्हें नई जिंदगी दे चुके हैं. बरेली के पशुपति बिहार कॉलोनी में रहने वाले शैलेश की उम्र आज 30 साल है और इस उम्र में शैलेश सड़कों पर बेसहारा पड़े लोगों से लेकर मनोरोगियों की जिंदगी के लिए काम कर रहे हैं. मानसिक रोगियों के इलाज के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं. यही नहीं उनको उनके घरों तक पहुंचा रहे हैं.

शैलेश खुद कहते हैं कि, ‘नैदानिक मनोविज्ञान यानि की क्लिनिकल साइकोलॉजी में एमए करने के बाद मैंने पीएचडी की शुरूवात की थी. इसी दौरान मुझको बरेली के मानसिक अस्पताल में जाना पड़ा था. वहां जाकर मैं कुछ मनोरोगियों से मिला. जहां कुछ मरीज़ वहीं सारी उम्र तड़पते रहते हैं तो वहीं कुछ मरीज़ों के परीजन उन्हें अपने साथ घर ले जाते हैं. यही सब देखकर मैंने निश्चय किया था की जो लोगों यहां बेबसी, बदहवासी और जिल्लत की जिंदगी जीते हैं, मैं उन्हें उनके परिजों से मिलाऊंगा.’

बेसहारा लोगों को उनके घर तक पहुंचाना बन गया है मकसद-शैलेश कुमार

शैलेश बताते हैं कि, ‘इसी तरह आज से ठीक 5 साल पहले 2014 में नेपाल की रहने वाली ललिसरा अपने घर से गायब हो गई थी. क्योंकि उस दौरान उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी. इस दौरान न जानें कैसे वो उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर आ गई थी. जिसके बाद उन्हें बरेली के ममता आश्रय स्थल में भेज दिया गया था. जब मुझको पता चला तो मैं ममता आश्रय स्थल गया और ललिसरा से बातचीत की, थोड़ी बहुत हिंदी जानने वाली ललिसरा ने मुझको बताया की वो नेपाल में इस पते पर रहती हैं तो मैंने उनके घर का पता लगाने के लिए नेपाल गया और आखिरकार एक हफ्ते की कड़ी मशक्त के बाद मुझको ललिसरा का घर मिल गया. जिसके बाद उसके घर वाले आए और ललिसरा को ले गए.’

कॉउंसलिंग के जरिए वापस आई याददाश्त-शैलेश

ठीक इसी तरह साल 2014 में शैलेश को बरेली के दोहरा चौराहे पर भटिंडा के रहने वाले हरमेश शैलेश को लावारिस हाल में मिले थे. उस समय हरमेश की उम्र 50 साल थी. उस दौरान उन्होंने उन्हें मानसिक चिकित्सालय, बरेली में भर्ती कराया था. इस दौरान शैलेश उनसे मिलने जाते थे, बात करते थे, उनकी कॉउंसलिंग किया करते थे. जब हरमेश ठीक हुए तो उन्होंने बताया वो पंजाब के पटियाला शहर में रहते हैं. इस दौरान शैलेश वहां गए और उनके परिवार वालों लेकर आए. इस दौरान किसी को यकीन नहीं हुआ था की हरमेश जिंदा हैं. क्योंकि हरमेश की स्थिति 14 साल पहले खराब हुई थी, जिस समय उनकी पत्नि उनको छोड़कर चली गई थी.

बिहार की गुड़िया 16 साल बाद मिली अपने घर वालों से-शैलेश कुमार

शैलेश बताते हैं कि, ‘बिहार के मधुबनी जिले की जयनगर में रहने वाली गुड़िया भी कुछ इसी तरह मुझको मिली थी, साल 1995 में फारूख शेख से शादी करने के बाद गुड़िया के पति ने उन्हें 7 साल बाद तलाक दे दिया था. जिसका सदमा न झेल पाने की वजह से गुड़िया मानसिक संतुलन खो बैठी थी और घर से भटक गई थी. भटकते-भटकते वो मेरठ पहुंच गई थी. इस दौरान 2003 में उन्हें मेरठ में ही मौजूद बरेली के नारी निकेतन में उनको भेज दिया गया था. इसके बाद 2014 में उनको बरेली के ममता आश्रय में भेज दिया गया. जब इस बात की जानकारी मुझको लगी तो मैं अपनी उसी मुहिम में जुट गया, जो मैं अब तक करता आया हूं और यही मेहनत मेरी एक बार फिर रंग लाई. साल 2018 में मुझको गुड़िया के परिजनों के बारे में पता चल गया और जब 16 सालों के बाद गुड़िया अपने परिजनों से मिली तो वो मंजर बेहद अलग था.

मरीज़ों के इलाज के लिए खरीद ली खुद के पैसे से एंबुलेंस-शैलेश कुमार

इसके आगे भी शैलेश बताते हैं, मैंने लोगों की मदद के लिए ही एक एंबुलेंस खरीदी है. जाहिर है, जहां एक तरफ आज के लोगों की शौक महंगी कार से लेकर महंगी बाईक होती है. वहीं शैलेश ने अपने पैसों से एंबुलेंस खरीदी है. ताकि मनोरोगियों को अस्पताल ले जाया जा सके. अक्सर अस्पताल वाले समय पर एंबुलेंस देने से शैलेश को इंकार कर देते थे. यही वजह रही की शैलेश ने अपने पैसे इकट्ठा करके एंबुलेंस खरीदी और आज लोगों को उसी एंबुलेंस से अस्पताल ले जाते हैं शैलेश कुमार…

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