असल कहानी : जब हाथ पर कपड़ा बांध उदयभान से लड़ते रहे ‘तानाजी’

‘स्वराज’ ये नारा भारतीय इतिहास में दिया गया सबसे अहम नारा है। आजादी की लड़ाई में स्वराज के नारे पर ही लोगों ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। लेकिन यह नारा सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ नहीं था। यह नारा असल में मराठा साम्राज्य के सबसे वीर राजा छत्रपति शिवाजी बुलंद ने किया था। मुगलों को देश की जमीं से भगाने और भारत की जमीं पर फिर से भारतीय समाज की स्थापना करने के ईरादे से शिवाजी ने पूर्ण स्वराज स्थापित करने की प्रतिज्ञा की थी। कहते हैं कि, केवल 16 साल की उम्र में उन्होंने स्वराज स्थापित करने की प्रतिज्ञा ली थी। असल में स्वराज्य एक सामाजिक और राजनयिक शब्द है जिसकी मूल विचारधारा भारत से हर तरह की विदेशी ताकतों को दूर भगाना है। स्वराज के जरिए शिवाजी महाराज ने संपूर्ण भारतवर्ष को एकजुट किया और विदेशी ताकतों के खिलाफ जंग छेड़ दी। इसी जंग में कुछ वीर योद्धाओं ने उनका साथ दिया और अपनी जान शिवाजी के लिए न्योछावर कर दी। शिवाजी के इन्हीं वीर योद्धाओं में से एक थे ‘तानाजी मालुसारे’। तानाजी के बारे में कहा जाता है कि, वो और शिवाजी बचपन के दोस्त थे और बड़े होने पर भी दोनों ने कई लड़ाईयां एक साथ लड़ी और जीत हासिल की।

तानाजी मालुसरे

 Tanaji Malusare पर बनी अजय देवगन की फिल्म

मराठा इतिहास के सबसे बड़ें योद्धाओं में से एक ‘तानाजी मालुसरे’ के बारे में कहा जाता है कि, वे शिवाजी महाराज के सबसे विश्वासपात्र सेनापती थे। तानाजी की बहादुरी के किस्से महाराष्ट्र में आपको बच्चे—बच्चे की जुबान पर सुनने को मिल जाएंगे। लेकिन भारत के अन्य हिस्सों में यह नाम लुप्त सा हो गया है। मगर हाल ही में तानाजी का नाम काफी चर्चा में आया है और इसका सिर्फ एक ही कारण है और वो है बॉलीवुड की नई फिल्म ‘तान्हाजी : द अनसंग वॉरियर’। जिसमें तानाजी के किरदार में अजय देवगन नज़र आ रहे हैं। वहीं उनके अलावा काजोल और सैफ अली खां भी फिल्म में नज़र आएंगें। फिल्म के ट्रेलर से पता चलता है कि, ये फिल्म उस लड़ाई के बारे में हैं जिसमें तान्हाजी की जान चली गई थी लेकिन मरते—मरते उन्होंने मराठाओं को जीत दिला दी। फिल्म की कहानी ‘सिंहगढ़ के किले पर’ हमले की कहानी के बारे में हैं। फिल्म बताती है कि, यह भारतीय इतिहास का पहला ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ था। अब फिल्म जब आएगी तब आएगी…. लेकिन असल में इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की कहानी क्या है यह इतिहास में दर्ज है। तो चलिए इस बारे में हम आपको बता देते हैं।

कहानी सर्जिकल स्ट्राइक के पहले की?

ये कहानी उस दौर से शुरू होती है जब सिंहगढ़ का नाम कोंधाना हुआ करता था। लगभग साढ़े सात सौ मीटर की ऊंचाई पर बने किले पर एक राजपूत कमांडर उदयभान का राजा हुआ करता था। ये किला 1665 में मुगलों और मराठों के बीच हुई पुरंदर की संधि के बाद औरंगजेब के पास चला गया था। इसके अलावा 23 अन्य किले भी मराठों को छोड़ने पड़े थे। इन किलों की आमदनी 4 लाख हूण प्रति साल थी। इस संधि के बाद शिवाजी के पास एक लाख हूण वार्षिक की आमदनी वाले 12 क़िले ही बचे थे। वहीं शिवाजी ने मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब की सेवा में अपने पुत्र शम्भाजी को भेजने की बात भी मान ली है।

इसी संधि के बाद शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए। जहां औरंगजेब ने उन्हें अपमानित भी किया और उन्हें उनके बेटे के साथ बंदी बना लिया। शिवाजी किसी तरह आगरा से भागकर महाराष्ट्र पहुंचे। शिवाजी को अपनी गलती का एहसास हो गया था उन्होंने पुंरदर संधि को अस्वीकार कर दिया और अपने सभी 23 क़िलों को वापिस हासिल करने की बात ठान ली।

तानाजी मालुसरे

क्यों जरूरी था सिंहगढ़ का किला

मुगलों के हाथ में सिंहगढ़ किला जाने के बाद इसकी देख—रेख उदयभान राठौड़ के हाथ में थी। पुणे से 20 किमी. दक्षिण पश्चिम में हवेली तहसील में स्थित यह किला 70,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह इतना बड़ा है कि, इसका एक गेट पुणे की ओर खुलता है तो दूसरा द्वार कल्याण की ओर। इसके बारे में कहा जाता हे कि इसपर जिसका राज होता था पूना पर भी उसी का राज होता था। शिवाजी की माता जीजी बाई भी इस किले पर मराठों की फतह चाहती थीं। मुगलों के हाथ यह किला देखकर उन्हें बहुत खींज होती थी। कई मानते हैं कि शिवाजी ने उन्हीं की जिद्द पर इस किले को हासिल करने की रणनीति बनाई।

कहानी पहले सर्जिकल स्ट्राइक की।

शिवाजी सिंहगढ़ क़िले को वापस जीतना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपने बचपन के दोस्त और भरोसेमंद सेनापति तानाजी को चुना। तानाजी शिवाजी का आदेश पाकर अपने सैनिकों के साथ किले को जीतने के लिए निकल पड़े। उनके साथ उनके भाई सूर्या जी भी थे। कहा जाता है कि, जब तानाजी को शिवाजी की ओर से बुलावा आया तो उस समय वे अपने बेटे की शादी की तैयारी में लगे हुए थे। लेकिन जंग के लिए उन्होंने बेटे की शादी को टाल दिया। इतिहास में दर्ज है कि, तानाजी ने शिवाजी का आदेश मिलने के बाद कहा ‘पहले कोढाणा दुर्ग का विवाह होगा, बाद में पुत्र का। यदि मैं जीवित रहा तो युद्ध से लौटकर विवाह का प्रबंध करूंगा और अगर नहीं रहा तो शिवाजी महाराज हमारे पुत्र का विवाह करेंगे।

तानाजी मालुसरे

लड़ाई को लेकर इतिहासकार बताते हैं कि, जब तानाजी ने किले पर चढ़ाई की तो सूर्या जी अपनी सेना के साथ किले के कल्याण द्वार पर पहुंच गए। और दरवाज़ा खुलने का इंतजार करने लगे। यहां पर भी एक लोक कहानी प्रचलित है जिसे ज्यादातर इतिहासकार अफवाह बताते हैं। बताया जाता है कि मराठा सेना ने क़िले पर चढ़ने के लिए एक विशालकाय छिपकली से मदद ली थी। इस छिपकली की कमर पर रस्सी बाँध कर इसे दीवार पर चढ़ाया गया था और बाद में इसी रस्सी के सहारे तानाजी और उनकी सेना किले में दाखिल हुई। इस विशालकाय छिपकली का नाम ‘यशवंती’ बताया जाता है। जो शिवाजी महाराज की पालतू थी। स्टीवर्ट गॉर्डन ने भी अपनी किताब ‘द मराठाज़’ में लिखा है कि मराठा सैनिक रस्सी नीचे फेंके जाने के बाद क़िले पर चढ़े।

तानाजी और उदयभान के बीच हुई भीषण लड़ाई।

किले पर चढ़ने के बाद माराठा सैनिकों ने मुगलों की सेना को गाजर मूली की तरह काटना शुरू कर दिया। लेकिन इसी बीच किले के दूसरे सैनिको को इस बारे में पता लग गया। उधर अभी भी सारे मराठा सैनिक ऊपर नहीं चढ़े थे। ऐसे में तानाजी और उनकी सेना ने मुगलों को तब तक रोके रखा जब तक सभी सैनिक ऊपर नहीं पहुंच गए। इसी बीच किले का रखवाला उदयभान भी वहां पहुंच गया। ताना जी और उदयभान के बीच भीषण लड़ाई हुई। दोनों की लड़ाई में अचानक उदयभान के एक वार से तानाजी की ढ़ाल बीच से फट गई। इसके बाद तानाजी ने कपड़े को अपने एक हाथ पर बांध कर लड़ाई लड़ी। दोनों एक दूसरे के बराबर थे। तानाजी और उदयभान दोनों ने एक दूसरे को इस लड़ाई में इतना घायल कर दिया की दोनों की मौत हो गई।

तानाजी की मौत के बाद मराठा सेना इधर—उधर भागने लगी। लेकिन उसी समय तानाजी के भाई सूर्याजी वहां आ पहुंचे और सेना को इकट्ठा कर मुगलों को किले से खदेढ़ दिया। मराठाओं ने सिंहगढ़ किले पर तो कब्जा कर लिया लेकिन अपने शेर को इस लड़ाई में खो दिया। किले पर फतह के बाद भी शिवाजी को इस विजय पर खुशी नहीं हुई क्योंकि तानाजी को खोने का गम उन्हें सबसे ज्यादा था। उस समय शिवाजी ने कहा था’ ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’ यानि ‘गढ़ तो हाथ में आया पर मेरा सिंह (तानाजी) चला गया। तानाजी की इस विजय पर ही इस किले का नाम ‘सिंहगढ़ का किला’ रखा गया। इस घटना के दो साल बाद फिर मुगलों ने इसे अपने कब्जे में ले लिया लेकिन नावजी बालकावडे ने तानाजी की तरह लड़ते हुए इसे दोबारा मुगलों से मुक्त करा दिया। आख़िर में एक और लड़ाई इस किले के लिए हुई जिसमें महारानी ताराबाई ने औरंगजेब से लड़कर इस क़िले पर जीत हासिल की।

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