‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ से जब मिले थे रविन्द्र नाथ टैगोर, हुई थी इस टॉपिक पर बात

‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ इस एक नाम को हर एक आदमी आज की इस दुनिया में जरूर जानता है। आइंस्टीन को हम विज्ञान की दुनिया का पहला मेगास्टार कह सकते हैं जिनके बारे में दुनिया का हर बच्चा जानना चाहता है और जिनकी कहानियां दुनिया के हर बच्चे को इंस्पायर करती हैं। ‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ के बारे में ज्यादात्तर लोग दो बाते जानते ही है, पहला उनका चेहरा जो थोड़ा गोल है और सर पर अलग ही तरह के घुंघराले बाल हैं। दूसरा उनके सापेक्ष के सिद्धांत का फॉर्मूला यानि E=mc2। आइंस्टीन अपने—आप में एक अजूबे थे, कई लोग उन्हें सिरफिरा वैज्ञानिक कहते थे और शायद इसलिए जब यह वैज्ञानिक मरा तो उसके बाद भी दुनिया ने उसके दिमाग के ऊपर रिसर्च किया।

आइंस्टीन की एक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे लेकिन साथ ही वे एक एथिस्ट यानि की नास्तिकतावादी थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे दूसरों के विचारों को तरजीह नहीं देते थे। आइंस्टीन को जितना दुनिया में लोग शायद याद नहीं करते उतना भारत में युवा उनके फैन हैं और इसका एक बड़ा कारण है उनका खोज जिसमें उन्होंने पता लगाया था कि ‘मास/द्रव्यमान और ऊर्जा/एनर्जी एक ही चीज़ के अलग—अलग रुप हैं’। E=mc2 इसी का फॉर्मूला। सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत यह साबित करता है कि ऊर्जा और द्रव्यमान अंतरिक्ष व समय को विकृत करते हैं। इन्हीं प्रतिष्ठित विचारों ने उन्हें सार्वजनिक प्रसिद्धि दिलाई थी।

Einstein,Rabindranath Tagore

Einstein की खोज को भारत में मिली ज्यादा स्वीकारिता

आइंस्टीन की इस खोज को भारत में बहुत ज्यादा स्वीकारता मिली। यहां के वैज्ञानिक उस दौर में उनसे समपर्क में थे। वहीं 1919 में जब इस सिद्धांत की पुष्टि भी नहीं हुई थी तब ही भारत में उनकी इस खोज का रिकॉर्डेड अनुवाद किया गया था। महान वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस को आइंस्टीन के संग काम करने का मौका मिला था। भारतीय वैज्ञानिको के संग आइंस्टीन के संबंध बहुत अच्छे रहे तो थे ही लेकिन उनका नीजी रूझान भी भारत और इसके पुरातन ज्ञान की ओर हमेशा रहा। आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि

 “हम भारतीयों के कर्ज़दार हैं, जिन्होंने हमें गिनती करना सिखाया। जिसके बिना कोई भी सार्थक वैज्ञानिक खोज नहीं की जा सकती थी।”

आइंस्टीन को भारत पसंद था, लेकिन वो एक एथिस्ट थे ऐसे में दुनिया के लिए सबसे ज्यादा चौकानेवाली बाते रहीं उनकी और भारतीय नोबोल प्राइज विजेता कवि और मिस्टिक मैन रविन्द्र नाथ टैगोर की मुलाकात। आइंस्टीन को टैगोर के संग बात करना पसंद था और यहीं कारण है की दोनों के बीच लगातार चिट्ठियों के जरिए बात होती रही। लेकिन पूरी दुनिया ने उस पल को सबसे ज्यादा तरजीह दी जब फिलॉस्पी और साइंस की दुनिया के दो महान व्यक्ति की आमने सामने मुलाकात हुई।  

आइंस्टीन ने भी इस मुलाकात और इस दौरान हुई बातचीत को लेकर कहा था ‘यह मुलाकात सबसे उत्तेजक और बौद्धिक रूप से उत्साही चर्चा वाली रही”। उन दोनों की यह मुलाकात और इस दौरान हुई बातचीत जल्द ही मीडिया में सनसनी बन गई और कई प्रकाशनों के पास इसकी रिकॉर्डिंग भी थी। उस समय द न्यूयॉर्क टाइम्स ने “आइंस्टीन और टैगोर प्लंब द ट्रुथ” शीर्षक के संग इस मुलाकात को लेकर एक लेख लिखा और “मैनहट्टन में एक गणितज्ञ और एक रहस्यवादी की मुलाकात” कैप्शन लिखकर एक यादगार तस्वीर भी साथ में छापी।

Einstein और टैगोर के बीच हुई बातचीत

आइंस्टीन और टैगोर के बीच कई मामलों को लेकर बातचीत हुई। 1930 में जब दोनों मिले तो दुनिया की मीडिया के केन्द्र में रहें। दोनों के बीच कई मामलों को लेकर बातचीत हुई लेकिन जो दुनिया के लोगों के बीच चर्चा का विष्य बनी वो चर्चा थी  धर्म और विज्ञान को लेकर हुई बातचीत, आइये पढ़ते हैं क्या चर्चा हुई :—

टैगोर: आप गणितज्ञों के साथ दो प्राचीन इकाई, समय और अंतरिक्ष की खोज में व्यस्त हैं। जबकि मैं देश में मनुष्य की वास्तविक दुनिया कर ब्रह्माण्ड की यथार्थता पर भाषण दे रहा हूँ।

आइंस्टीन: क्या आप दुनिया से अलग दिव्य में विश्वास करते हैं?

टैगोर: अलग नहीं है। मनुष्य का अनंत व्यक्तित्व ब्रह्मांड को समझता है। ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है जिसे मानव व्यक्तित्व द्वारा कम नहीं किया जा सके, और यह साबित करता है कि ब्रह्मांड की सत्य मानव सत्य है।

आइंस्टीन: ब्रह्मांड की प्रकृति के बारे में दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं – दुनिया एकता के रूप में मानवता पर निर्भर है, और दुनिया यथार्थ रूप में मानव कारकों से स्वतंत्र है।

टैगोर: जब हमारा ब्रह्मांड मनुष्यों के साथ सामंजस्य में होता है, तो हम इसे सत्य के रूप में जानते हैं, हम इसके सौंदर्य को महसूस करते हैं।

आइंस्टीन: यह ब्रह्मांड की पूरी तरह से एक मानव अवधारणा है।

टैगोर: दुनिया एक मानव संसार है – इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी वैज्ञानिक व्यक्ति का है। इसलिए, हमारे अलावा कोई और दुनिया मौजूद नहीं है; यह एक सापेक्ष दुनिया है, जो अपनी वास्तविकता के लिए हमारी चेतना पर आधारित है। कारणों और आनंद के कुछ मानक है जो इसे सत्य बनाते हैं। शाश्वत व्यक्ति के मानक जिसके अनुभव हमारे अनुभवों के माध्यम से संभव होते हैं।

आइंस्टीन: यह मानव इकाई की अनुभूति है।

टैगोर: हाँ, एक शाश्वत इकाई। हमें अपनी भावनाओं और गतिविधियों के माध्यम से इसका एहसास करना होगा। हम अपनी व्यक्तिगत सीमाओं में सर्वोच्च इंसान की अनुभूति करते हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है। विज्ञान उस से संबंधित है जो व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं है; यह सत्य की व्यक्तित्वहीन मानव दुनिया है। धर्म इस सत्य को महसूस करता है और उन्हें हमारी गहरी जरूरतों के साथ जोड़ता है। इससे सत्य की हमारी व्यक्तिगत चेतना सार्वभौमिक महत्व प्राप्त करती है। धर्म सत्य को मूल्य देता है, और हम इसके साथ सद्भाव के माध्यम से सत्य को अच्छे रूप में जानते हैं।

आइंस्टीन: मैं साबित नहीं कर सकता, लेकिन मैं पाइथागोरियन में विश्वास करता हूँ जो कहता है कि सत्य मनुष्यों से स्वतंत्र है। यही निरंतरता के तर्क की समस्या है।

टैगोर: सत्य, जो सार्वभौमिक है, अनिवार्य रूप से मानवीय होना चाहिए; अन्यथा, जो भी हम व्यक्तियों को सत्य के रूप में महसूस होता है, कभी भी सत्य नहीं कहा जा सकता है। कम से कम, वह सच्चाई जिसे वैज्ञानिक रूप में वर्णित किया गया है और जिसे केवल तर्क की प्रक्रिया के माध्यम से जाना जा सकता है – दूसरे शब्दों में, मानव के विचारों द्वारा। भारतीय दर्शन के अनुसार ‘एक ब्राह्मण है, जो परम सत्य है, जिसे इंसानी दिमाग की तर्क शक्ति से नहीं जाना जा सकता न ही जिसके बारे में शब्दों के जरिए बयां किया जा सकता है। उसके बारे तभी जाना जा सकता है जब इंसान खुद को अनंत में समाहित या विलीन कर ले और यह केवल मेडिटेशन यानि की ध्यान से ही हो सकता है।….. लेकिन ऐसी सच्चाई विज्ञान की नहीं हो सकती। सत्य की प्रकृति जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं वह एक उपस्थिति है, यह कहना है कि सत्य वह है जो मानव मन के लिए सच प्रतीत होता है, इसे ही माया या भ्रम कहा जा सकता है।

Einstein,Rabindranath Tagore

आइंस्टीन : यह किसी व्यक्ति का भ्रम नहीं है, बल्कि प्रजातियों का है।

टैगोर : प्रजाति भी एक तरह की इकाई है, यह भी मानवता के अनुभव के जरिए जुड़ी हुई है। इसलिए पूरा मानव मन एक समय पर एक ही सत्य का सत्य का अनुभव करती है।

आइंस्टीन : जर्मन भाषा में स्पेसीज शब्द का प्रयोग संपूर्ण मानव जाति के लिए किया गया है, यहां तक कि इसमें बंदर और मेढकों तक को शामिल किया गया है। ऐसे में क्या सत्य हमारी चेतना से अलग है?

टैगोर:  हम जिसे सत्य कहते हैं वो वास्तविकता के सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव पहलुओं के बीच विवेकपूर्ण साम्य में अंतरनीहित है और ये दोनों हि सुपरपर्सनल मैन से जुड़ा है।  

आइंस्टीन: हररोज की अपनी जिंदगी में हम कई ऐसे काम अपने दिमाग की बदौलत करते हैं जिसके लिए हम जिम्मेदार नहीं होते, हमारा दिमाग बाहर की रियलिटी को देखकर भी उससे अलग निरपेक्ष रहकर काम करता है। एग्जांप्ल के तौर पर इस कमेरे में कोई नहीं भी हो तो तो टेबल वहीं की बवही रहेगी।

टैगोर : हां, ये हमारे मानवीय दिमाग से बाहर है लेकिन यह यूनिवर्सल माइंड से बाहर नहीं है। टेबल वो चीज है जो हमारी चेतना द्वारा इंद्री गोचर है।  

आइंस्टीन : अगर इस घर में कोई नहीं है, तब भी यह मेज वहीं रहेगी, लेकिन आपके ही विचारों से यह बात पहले ही अनुचित है। क्यों कि हम यह व्याख्या नहीं कर सकते कि इसका अर्थ क्या है कि हमसे निरपेक्ष रहकर वह मेज वहीं  रखी हुई है। सत्य के अस्तित्व की व्याख्या मानव जाति से परे जा कर न तो की जा सकती है और न ही इसे साबित किया जा सकता है। लेकिन यह एक ऐसा विश्वाास है जिसे कोई भी फिर चाहे वो छोटे से छोटा जीव ही क्यों न हो छोड़ना नहीं चाहता। हमने सत्य को सुपरह्यूमन ऑब्जेक्टिविटी के सााि प्रतिस्थापित कर दिया है। यह हमारे लिए परम आवश्यक है, इसका कोई विकल्प नहीं है। यह वास्तविक्ता हमारे अस्तित्व, हमारे अनुभव और हमारे दिमाग से निरपेक्ष और मुक्त है। हालांकि हम यह नहीं कह सकते कि इसका अर्थ क्या है।

टैगोर :  किसी भी स्थिति में अगर कोई ऐसा सत्य है जिसका मानवजाति से कोई सरोकार नहीं है, तो हमारे लिए यह पूरी तरह से अस्तित्वहीन है।

आइंस्टीन :  ऐसे में तो मैं आपसे भी ज्यादा धार्मिक और आस्थावान हो जाऊंगा।

टैगोर : मेरे खुद के व्यक्तित्व में उस सुपरह्यूमन पुरूष, सार्वभौम आत्मा यानि भगवान के साथ  
सामंजस्य, एक लय कायम करना ही धर्म है।  

दोनों के बीच ‘मीनिंग ऑफ रिएलिटी’ का सवाल चर्चा का मुख्य केन्द्र था। आइंस्टीन ने जोर दिया कि विज्ञान को किसी भी पर्यवेक्षक के अस्तित्व से स्वतंत्र होना चाहिए। वहीं टैगोर का मानना है कि, भले ही पूर्ण सत्य मौजूद हो सकता है पर उसे जानना मानव मन के लिए दुर्गम होगा। न्यूयॉर्क टाइम्स पत्रिका के अनुसार दोनों एक दूसरे के योगदान, सच की खोज और संगीत के प्रति प्रेम के बारे में जानने के लिए ज्यादा उत्सुक थे।

“आइंस्टीन और टैगोर के संवाद रचनात्मक और दार्शनिक विचारों से भरे हुए थे और साथ ही साथ दोनों को कला में भी रूचि है। इस चर्चा में यह बात भी दिखी कि आंइस्टीन भी आध्यात्मिकता पर निर्भर हैं लेकिन अपने तरीके से।

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