अचानक चर्चा में आए Article 375 के बारे में कितना जानते हैं आप?

बलात्कार या रेप हमारे सभ्य समाज का एक घिनौना और कड़वा सच है। एक ऐसा कड़वा सच जिसका घूंट हर दिन देश को पीना पड़ता है। आए दिन अखबारों से लेकर न्यूज चैनलों पर ना जाने कितनी ही बलात्कार की खबरें सामने आती रहती हैं।

बात अगर आज की करें, तो आज के समय में बलात्कार हमारे मॉडर्न सामाज के ऊपर एक ऐसा बदनुमा दाग है जो पूरे सामाज की साख पर बड़े सवालिया निशान के साथ—साथ उसकी मर्यादाओं को तार—तार कर देता है। बलात्कार चाहे किसी बच्ची के साथ हो या फिर एक बुजुर्ग महिला के साथ, मगर ये ना सिर्फ उनके शरीर को बल्की उनकी आत्मा और मन को भी जख्मी कर देता है। 

रेप के हर 4 मामलों में से केवल एक पर होता है फैसला

भारत में रेप उन चार अपराधों में से एक है जो महिलाओं पर किए जाते हैं। 2013 के नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो (एनसीआरबी) की एनुअल रिपोर्ट के आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2012 में देशभर में कुल 24,923 रेप के मामले दर्ज किए गए थे। जिनमें से 98 प्रतिशत वारदातों को अंजाम विक्टिम के जानने वालों द्वारा दिया गया था। तो वहीं रेप के मामलों में आरोपियों को सजा मिलने के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि पिछले 40 सालों में इन आंकड़ों में तेजी से कमी आई है। हर 4 मामलों में से केवल एक मामले में ही फैसला हो पाता है।

भारतीय कानून की बात करें तो इंडियन पेनल कोड यानि आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार के मामलों को बहुत संगीन अपराधों की लिस्ट में रखा गया है। भारतीय कानून इसे जघन्य अपराध मानता है। वहीं धारा 376 में इस अपराध के लिए सजा का प्रावधान किया गया है। साल 2012 का निर्भया रेप मामला कोई कैसे भूल सकता है। इस रेप के मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। निर्भया के साथ जिस तरह का बर्ताव हुआ था उसे सुनकर आज भी लोगों की रूह सिहर उठती है। इसी घटना के बाद देश में आईपीसी की धारा 375 में बदलाव की मांगे उठी और बलात्कार के मामलों को लेकर कानून को पहले से और ज्यादा सख्त बनाया गया।

फिल्म ‘सेक्शन 375’ से फिर शुरू हुई इस कानून की चर्चा

पिछले कुछ दिनों से इसी धारा 375 की चर्चा जोरों पर है। और वो बस इसलिए क्योंकि हाल ही में एक फिल्म आई है जिसका नाम है ‘सेक्शन 375’। फिल्म में अक्षय खन्ना और रिचा चड्ढा लीड किरदार में हैं। फिल्म में रेप के मामलों को लेकर कोर्ट के अंदर होने वाली बहस और इस दौरान के दांव-पेचों को बखूबी दिखाया गया है। फिल्म की खूब चर्चा है। वैसे तो इसके ट्रेलर से ही फिल्म चर्चा में आ गई थी और अब जब फिल्म रिलीज हो चुकी है तो रिव्यू बता रहे हैं कि फिल्म की कहानी बेहद शानदार है।

Article 375
फिल्म ‘सेक्शन 375’ से फिर शुरू हुई इस कानून की चर्चा

हालांकि, बलात्कार को लेकर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन पहली बार एक फिल्म बलात्कार से जुड़े कानून के ऊपर है। जो आसान तरीके से लोगों के बीच इस कानून को लेकर जागरूकता फैलाने की नीयत से बनाई गई है। कानून के जानकारों की माने तो रेप के मामलों में न्याय के लिए पीड़िता की राह आसान नहीं होती है। फिल्म में रेप के बाद के हर एक पहलू को दिखाने की कोशिश की है।

Article 375 की पूरी जानकारी

लेकिन हम यहां फिल्म के बारे में कम और सेक्शन 375 के बारे में ज्यादा बात करेंगे। बलात्कार घिनौना अपराध होने के साथ ही बेहद संवेदनशील मामला है। लेकिन इससे जुड़े कानून के बारे में लोगों के पास पूरी जानकारी नहीं होती। जिसके कारण रेप से जुड़े मामलों में आरोपी बचकर निकल जाते हैं। साल 2013 में रेप से जुड़े कानून में बड़े बदलाव किए गए। साथ ही इस दौरान बलात्कार की परिभाषा में भी कई बदलाव किए गए।

जे.एस.वर्मा कमीशन की सिफारिशों से बदले कानून

2012 में निर्भया मामले को लेकर देश के लोगों का गुस्सा उबाल पर था। इस मामले को लेकर लोग सड़कों पर आ गए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने कानूनों में बदलाव की पहल शुरू की। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जे.एस वर्मा की अगुवाई में एक कमीशन बनाई गई जिसने कानून में बदलाव को लेकर कई सिफारिशें रखीं।

29 दिनों में 631 पन्नों की रिपोर्ट इस कमीशन ने सरकार को भेज दी। इसी रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने एंटी रेप लॉ के लिए ऑर्डिनेंस जारी किया और अपराधिक विधि संशोधन अधिनियम 2013 को लागू किया। जो 3 फरवरी 2013 से प्रभाव में आ गया। इसी संशोधन में रेप की डेफिनेशन को और विस्तार दिया गया।

Article 375
Article 375 की पूरी जानकारी

संसोधन के बाद से Article 375 में आए बदलाव

संशोधन के जरिए कानून में बदलाव के बाद रेप की परिभाषा को पहले से व्यापक बनाया गया। बलात्कार की परिभाषा के बारे में बताते हुए इस कानून में कहा गया है कि पुरूष अगर किसी महिला से उसकी मर्जी के खिलाफ, उसे डरा धमकाकर, किसी पागल महिला का फायदा उठाकर या महिला के शराब या अन्य चीज़ के नशे में होने का फायदा उठाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे बलात्कार कहा जाता है। इसमें कहा गया है कि चाहे किसी भी कारण संभोग क्रिया पूरी हुई हो या न हुई हो उसे बलात्कार ही माना जाएगा।

इस कानून के सेक्शन 375 के अंतर्गत प्रावधान किया गया कि रेप का होना तब माना जाएगा जब

  • महिला के साथ पुरूष ने जबरन शारीरिक संबंध बनाएं हो
  • महिला के प्राइवेट पार्ट में पुरूष द्वारा कोई भी वस्तु या अपना लिंग डालना
  • अगर लड़की की उम्र 18 से कम है और यौन संबंध सहमती से हुआ है तब भी इसे रेप माना जाएगा।

इस तरह के हैं सजा के प्रावधान

निर्भया मामले के बाद देश में कई रेप की वारदातें हुई जिसको मीडिया कवरेज मिला। मसलन लोगों ने सरकार से इस घिनौने अपराध के मामले में दोषी को मौत की सजा देने की मांग की। सामाज में उठ रहे इस मांग को लेकर सरकार ने भी कानून में सख्ती दिखाई और सेक्शन 376 में कड़े प्रावधान किए।

इसमें ये प्रावधान किए गए 

  • आईपीसी के सेक्शन 376 के तहत कम से कम 7 साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया।
  • सेक्शन 376ए के तहत प्रावधान किया गया कि अगर रेप के कारण महिला मौत के कगार पर पहुंच गई हो तो दोषी को फांसी की सजा भी हो सकती है।
  • 376 बी में कहा गया कि अलगाव में रह रही पत्नी संग रेप पर 7 से 10 साल की सजा हो सकती है।
  • 376 सी में कहा गया कि सरकारी संरक्षण में रह रही महिला के साथ रेप पर 5 से 10 साल तक सजा हो सकती है।
  • वहीं 376 डी में गैंगरेप को लेकर प्रावधान किया गया कि दोषियों को कम से कम 20 और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद हो सकती है।
  • वहीं 376ई में प्रावधान है कि पहले से दोषी शख्स अगर दोबारा यह काम करता है तो उसे उम्रकैद से लेकर फांसी तक की सजा दी जा सकती है।

छेड़छाड़ के कानूनों में भी बदलाव

वर्मा कमीशन की सिफारिशों को मानते हुए सरकार ने महिलाओं के प्रति अन्य अपराधों जैसे की छेड़छाड़ के मामलों को लेकर भी कानून में संसोधन किए गए। सेक्शन 354 में पहले ऐसे मामले में 2 साल की सजा का प्रावधान था, लेकिन बाद में इसे बदलकर कम से कम 1 साल और ज्यादा से ज्यादा 5 साल कर दिया गया। वहीं इस मामले को गैर जमानती भी बना दिया गया।

इसके अलावे इसमें कई और सेक्शन हैं, जैसे महिला संग सेक्सुअल नेचर का बर्ताव करने पर सेक्शन 354ए पार्ट 1 के तहत, महिला से सेक्सुअल डिमांड या फिर आग्रह या उसकी मर्जी के बिना उसे पॉर्नोग्राफी दिखाने पर सेक्शन 354ए पार्ट 3 के तहत कार्रवाई करने का कानून है। वहीं महिला को जबरन कपड़े उतारने पर मजबूर करने या उतार देने पर केश दर्ज करने की बात है। इस सेक्शन के तहत अगर कोई व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसे 3 से 7 साल की जेल हो सकती है।

ये निर्णय भी लिए गए

साल 2013 में 375 के कानूनों में बदलाव कर रेप के मामलों को सख्ती से और जल्दी निपटाने की बात कही गई। इसके तहत ‘टू फिंगर टेस्ट’ को भी इन ह्यूमन, अनसाइंटिफिक और ‘राइट टू प्राइवेसी’ के अधिकार का हनन माना गया। वहीं रेप के मामलों को लेकर फास्ट ट्रेक कोर्ट्स और पीड़िता की हर तरह की मदद के लिए वन स्टॉप सेन्टर की स्थापना की गई। अभी तक 1 हजार से ज्यादा फास्ट ट्रेक कोर्ट्स देश भर में खोले गए हैं। वहीं 33 से ज्यादा वन स्टॉप सेन्टर भी बने हैं।

कनविक्शन रेट अभी भी है कम

ऐसा नहीं है कि सेक्शन 375 के बाद बलात्कार की घटनाओं में कमी आई हो। हाल ही में कठुआ और उन्नाव रेप के मामलों ने देश को एक बार फिर से झकझोर दिया है। एनआरबीसी के डेटा में एक बात सामने आई कि अब पहले की तुलना में रेप के मामले ज्यादा दर्ज हो रहे हैं यानि की लोग अब इस मामले को छुपा कर या दबा कर रखने के बजाए कानून के पास न्याय के लिए पहुंच रहे हैं। लेकिन अभी भी भारत में रेप के मामलों को लेकर कनविक्शन रेट 25.5 प्रतिशत ही है, जो बहुत कम है। यानी 4 में से सिर्फ 1 मामले में फैसला हो पाता है।

कानून का होता गलत इस्तेमाल

सेक्शन 375 को जहां पहले से ज्यादा सख्त किया गया है वहीं इस कानून के कई गलत इस्तेमाल भी सामने आए हैं। साल 2012 के निर्भया कांड के बाद 2013—14 में रेप के ज्यादा मामले दर्ज हुए। लेकिन जांच के दौरान इनमें से आधे से ज्यादा मामले झूठे निकले। 2014 में दिल्ली कमीशन फॉर वुमेन की रिपोर्ट में ही इस बात को बताया गया था कि उस साल 53 प्रतिशत झूठे रेप के मामले दर्ज हुए थे। ऐसे में कानूनों की सही जानकारी होना एक आम नागरिक के लिए बहुत ही जरूरी हो जाता है, ताकि वो इसके सामाजिक और व्यवहारिक पहलुओं में तालमेल बैठा सके।

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